Heart Broken Poetry (page 216)
ख़त्म हुई शब-ए-वफ़ा ख़्वाब के सिलसिले गए
अज़ीज़ हामिद मदनी
करम का और है इम्काँ खुले तो बात चले
अज़ीज़ हामिद मदनी
जी-दारो! दोज़ख़ की हवा में किस की मोहब्बत जलती है
अज़ीज़ हामिद मदनी
जी है बहुत उदास तबीअत हज़ीं बहुत
अज़ीज़ हामिद मदनी
इस गुफ़्तुगू से यूँ तो कोई मुद्दआ नहीं
अज़ीज़ हामिद मदनी
हिकायत-ए-हुस्न-ए-यार लिखना हदीस-ए-मीना-ओ-जाम कहना
अज़ीज़ हामिद मदनी
हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
हवा आशुफ़्ता-तर रखती है हम आशुफ़्ता-हालों को
अज़ीज़ हामिद मदनी
हरम का आईना बरसों से धुँदला भी है हैराँ भी
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़लत-बयाँ ये फ़ज़ा महर ओ कीं दरोग़ दरोग़
अज़ीज़ हामिद मदनी
फ़िराक़ से भी गए हम विसाल से भी गए
अज़ीज़ हामिद मदनी
एक-आध हरीफ़-ए-ग़म-ए-दुनिया भी नहीं था
अज़ीज़ हामिद मदनी
एक ही शहर में रहते बस्ते काले कोसों दूर रहा
अज़ीज़ हामिद मदनी
दिलों की उक़्दा-कुशाई का वक़्त है कि नहीं
अज़ीज़ हामिद मदनी
बैठो जी का बोझ उतारें दोनों वक़्त यहीं मिलते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
ऐ शहर-ए-ख़िरद की ताज़ा हवा वहशत का कोई इनआम चले
अज़ीज़ हामिद मदनी
आज मुक़ाबला है सख़्त मीर-ए-सिपाह के लिए
अज़ीज़ हामिद मदनी
थका हारा निकल कर घर से अपने
अज़ीज़ फ़ैसल
जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर
अज़ीज़ एजाज़
जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर
अज़ीज़ एजाज़
ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ज़मीन मोम की होती है मेरे क़दमों में
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
उम्र भर रास्ते घेरे रहे उस शख़्स का घर
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
तिश्नगी मेरी मुसल्लम है मगर जाने क्यूँ
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मेरे हालात ने यूँ कर दिया पत्थर मुझ को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं उस की धूप हूँ जो मेरा आफ़्ताब नहीं
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं भी साहिल की तरह टूट के बह जाती हूँ
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
कुरेदता है बहुत राख मेरे माज़ी की
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
जाने कितने राज़ खुलें जिस दिन चेहरों की राख धुले
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
हमारी बेबसी शहरों की दीवारों पे चिपकी है
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा