Heart Broken Poetry (page 261)
फ़सील-ए-सब्र में रौज़न बनाना चाहती है
अरशद अब्दुल हमीद
चिराग़-ए-दर्द कि शम-ए-तरब पुकारती है
अरशद अब्दुल हमीद
मैं पैरवी-ए-अहल-ए-सियासत नहीं करता
अर्श सिद्दीक़ी
हम कि मायूस नहीं हैं उन्हें पा ही लेंगे
अर्श सिद्दीक़ी
बस यूँही तन्हा रहूँगा इस सफ़र में उम्र भर
अर्श सिद्दीक़ी
ज़ंजीर से उठती है सदा सहमी हुई सी
अर्श सिद्दीक़ी
वक़्त का झोंका जो सब पत्ते उड़ा कर ले गया
अर्श सिद्दीक़ी
संग-ए-दर उस का हर इक दर पे लगा मिलता है
अर्श सिद्दीक़ी
फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं
अर्श सिद्दीक़ी
क्या साथ तिरा दूँ कि मैं इक मौज-ए-हवा हूँ
अर्श सिद्दीक़ी
हम हद-ए-इंदिमाल से भी गए
अर्श सिद्दीक़ी
हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूर-ए-वफ़ा है
अर्श सिद्दीक़ी
ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे
अर्श सिद्दीक़ी
दरवाज़ा तिरे शहर का वा चाहिए मुझ को
अर्श सिद्दीक़ी
बंद आँखों से न हुस्न-ए-शब का अंदाज़ा लगा
अर्श सिद्दीक़ी
बैठा हूँ वक़्फ़-ए-मातम-ए-हस्ती मिटा हुआ
अर्श सिद्दीक़ी
आँखों में कहीं उस के भी तूफ़ाँ तो नहीं था
अर्श सिद्दीक़ी
ये देखें राज़-ए-दिल अब कौन करता है अयाँ पहले
अर्श सहबाई
ये आइना था मगर ग़म की रहगुज़ार में था
अर्श सहबाई
मस्ती-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम से वाबस्ता रही
अर्श सहबाई
मैं हूँ ऐसे बिखरा सा
अर्श सहबाई
हज़ार हादसात-ए-ग़म रवाँ-दवाँ लिए हुए
अर्श सहबाई
हंगामा-हा-ए-बादा-ओ-पैमाना देख कर
अर्श सहबाई
दिल-ए-मुज़्तर से नालाँ हैं उधर वो भी इधर हम भी
अर्श सहबाई
दिल-ए-बेताब को बहलाने चले आए हैं
अर्श सहबाई
वो सहरा जिस में कट जाते हैं दिन याद-ए-बहाराँ से
अर्श मलसियानी
तौबा तौबा ये बला-ख़ेज़ जवानी तौबा
अर्श मलसियानी
न नशेमन है न है शाख़-ए-नशेमन बाक़ी
अर्श मलसियानी
'अर्श' पहले ये शिकायत थी ख़फ़ा होता है वो
अर्श मलसियानी
मेरे प्यारे वतन
अर्श मलसियानी