Heart Broken Poetry (page 384)
जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए
आबिद मुनावरी
चाँद से अपनी यारी थी
आबिद मुनावरी
बे-तमन्ना हूँ ख़स्ता-जान हूँ मैं
आबिद मुनावरी
और किस का घर कुशादा है कहाँ ठहरेगी रात
आबिद मुनावरी
अगले पड़ाव पर यूँही ख़ेमा लगाओगे
आबिद मुनावरी
मियाँ ये इश्क़ तो सब टूट कर ही करते हैं
आबिद मलिक
अभी से इस में शबाहत मिरी झलकने लगी
आबिद मलिक
ये कार-ए-ख़ैर है इस को न कार-ए-बद समझो
आबिद मलिक
शहर से जब भी कोई शहर जुदा होता है
आबिद मलिक
मैं ने लोगों को न लोगों ने मुझे देखा था
आबिद मलिक
कौन कहता है कि वहशत मिरे काम आई है
आबिद मलिक
हज़ार ता'ने सुनेगा ख़जिल नहीं होगा
आबिद मलिक
इक अजनबी की तरह है ये ज़िंदगी मिरे साथ
आबिद मलिक
दश्त में उस का आब-ओ-दाना है
आबिद मलिक
आसूदगान-ए-हिज्र से मिलने की चाह में
आबिद मलिक
आख़िरी बार ज़माने को दिखाया गया हूँ
आबिद मलिक
किसे ख़बर थी कि ख़ुद को वो यूँ छुपाएगा
आबिद ख़ुर्शीद
था मुख़्तसर वजूद जसीम-ओ-जरी न थी
आबिद काज़मी
जिन्हें था फ़ख़्र नवाब-ओ-नजीब होते हैं
आबिद काज़मी
ज़र्द मौसम की हवाओं में खड़ा हूँ मैं भी
आबिद करहानी
दश्त में छाँव कोई ढूँड निकाली जाए
आबिद करहानी
आलम-ए-ख़्वाब सही ख़्वाब में चलते रहिए
आबिद करहानी
ज़मीं से चल के तो पहुँचा हूँ आसमाँ तक मैं
आबिद हशरी
श्याम गोकुल न जाना कि राधा का जी अब न बंसी की तानों पे लहराएगा
आबिद हशरी
न कर्ब-ए-हिज्र न कैफ़्फ़ियत-ए-विसाल में हूँ
आबिद हशरी
शिकस्त
आबिद आलमी
रात
आबिद आलमी
अजनबी
आबिद आलमी
वो जो हर राह के हर मोड़ पर मिल जाता है
आबिद आलमी
वो इक निगाह जो ख़ामोश सी है बरसों से
आबिद आलमी