Heart Broken Poetry (page 385)
तुम ने जब घर में अंधेरों को बुला रक्खा है
आबिद आलमी
तुम ने जब घर में अँधेरों को बुला रक्खा है
आबिद आलमी
मिरा बदन है मगर मुझ से अजनबी है अभी
आबिद आलमी
क्या ख़बर कब से प्यासा था सहरा
आबिद आलमी
किसी मक़ाम पे हम को भी रोकता कोई
आबिद आलमी
ख़्वाब में गर कोई कमी होती
आबिद आलमी
जो शख़्स तुझ को फ़रिश्ता दिखाई देता है
आबिद आलमी
जब से अल्फ़ाज़ के जंगल में घिरा है कोई
आबिद आलमी
जब भी कमरे में कुछ हवा आई
आबिद आलमी
दे गया आख़िरी सदा कोई
आबिद आलमी
जो कहते हैं किधर दीवानगी है
आबिद अख़्तर
जो अपने आप को सब कुछ समझ ले
आबिद अख़्तर
अपनी कमी से पूछ न उस की कमी से पूछ
आबिद अख़्तर
सफ़र के बाद भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए
अभिषेक शुक्ला
कभी कभी तो ये वहशत भी हम पे गुज़री है
अभिषेक शुक्ला
सुर्ख़ सहर से है तो बस इतना सा गिला हम लोगों का
अभिषेक शुक्ला
सफ़र के बा'द भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए
अभिषेक शुक्ला
ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता
अभिषेक शुक्ला
हम ऐसे सोए भी कब थे हमें जगा लाते
अभिषेक शुक्ला
फ़सील-ए-जिस्म गिरा दे मकान-ए-जाँ से निकल
अभिषेक शुक्ला
दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें
अभिषेक शुक्ला
चलते हुए मुझ में कहीं ठहरा हुआ तू है
अभिषेक शुक्ला
अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का
अभिषेक शुक्ला
राह भटका हुआ इंसान नज़र आता है
अभिषेक कुमार अम्बर
एक ख़्वाहिश है बस जमाने की
अभिषेक कुमार अम्बर
छोड़ उन को न जाने किधर मैं गया
अभिषेक कुमार अम्बर
उन के लब पर मिरा गिला ही सही
अब्दुस्समद ’तपिश’
न जाने कौन फ़ज़ाओं में ज़हर घोल गया
अब्दुस्समद ’तपिश’
कौन पत्थर उठाए
अब्दुस्समद ’तपिश’
ख़ौफ़-ओ-वहशत बर-सर-ए-बाज़ार रख जाता है कौन
अब्दुस्समद ’तपिश’