Hope Poetry (page 146)

दिन ले के जाऊँ साथ उसे शाम कर के आऊँ

अंजुम सलीमी

चराग़ हाथ में हो तो हवा मुसीबत है

अंजुम सलीमी

गुज़र रहे हैं गुज़रने वाले

अंजुम रूमानी

नहीं नाम-ओ-निशाँ साए का लेकिन यार बैठे हैं

अंजुम रूमानी

जहाँ तक गया कारवान-ए-ख़याल

अंजुम रूमानी

है वाक़िआ कुछ और रिवायत कुछ और है

अंजुम रूमानी

दुखी दिलों के लिए ताज़ियाना रखता है

अंजुम रूमानी

दिन हो कि रात, कुंज-ए-क़फ़स हो कि सेहन-ए-बाग़

अंजुम रूमानी

दिन हो कि रात कुंज-ए-क़फ़स हो कि सेहन-ए-बाग़

अंजुम रूमानी

रंग इस मौसम में भरना चाहिए

अंजुम रहबर

जिन के आँगन में अमीरी का शजर लगता है

अंजुम रहबर

किस ने दी मुझ को सदा कौन-ओ-मकाँ के उस तरफ़

अंजुम नियाज़ी

मुझे कुछ देर रुकना चाहिए था

अंजुम ख़याली

शब-ए-फ़िराक़ अचानक ख़याल आया मुझे

अंजुम ख़याली

हँसी में टाल तो देता हूँ अक्सर

अंजुम ख़याली

इंसान की निय्यत का भरोसा नहीं कोई

अंजुम ख़लीक़

यही तुम पर भी खुलना है

अंजुम ख़लीक़

तुम्हारी पोरों का लम्स अब तक.....

अंजुम ख़लीक़

ए'तिराफ़

अंजुम ख़लीक़

चाँद हम दोनों से मुशाबह है

अंजुम ख़लीक़

मिरे जुनूँ को हवस में शुमार कर लेगा

अंजुम ख़लीक़

कितना ढूँडा उसे जब एक ग़ज़ल और कही

अंजुम ख़लीक़

कहो क्या मेहरबाँ ना-मेहरबाँ तक़दीर होती है

अंजुम ख़लीक़

कहाँ तक और इस दुनिया से डरते ही चले जाना

अंजुम ख़लीक़

हम अपने ज़ौक़-ए-सफ़र को सफ़र सितारा करें

अंजुम ख़लीक़

हर शे'र से मेरे तिरा पैकर निकल आए

अंजुम ख़लीक़

चाहे तू शौक़ से मुझे वहशत-ए-दिल शिकार कर

अंजुम ख़लीक़

बीते हुए लम्हात को पहचान में रखना

अंजुम ख़लीक़

बदल चुके हैं सब अगली रिवायतों के निसाब

अंजुम ख़लीक़

लौट कर यक़ीनन मैं एक रोज़ आऊँगा

अंजुम इरफ़ानी