Hope Poetry (page 208)
मह-रुख़ जो घरों से कभी बाहर निकल आए
अब्बास ताबिश
कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है
अब्बास ताबिश
खा के सूखी रोटियाँ पानी के साथ
अब्बास ताबिश
कस कर बाँधी गई रगों में दिल की गिरह तो ढीली है
अब्बास ताबिश
इतना आसाँ नहीं मसनद पे बिठाया गया मैं
अब्बास ताबिश
हवा-ए-मौसम-ए-गुल से लहू लहू तुम थे
अब्बास ताबिश
हर-चंद तिरी याद जुनूँ-ख़ेज़ बहुत है
अब्बास ताबिश
हँसने नहीं देता कभी रोने नहीं देता
अब्बास ताबिश
फ़क़त माल-ओ-ज़र-ए-दीवार-ओ-दर अच्छा नहीं लगता
अब्बास ताबिश
एक क़दम तेग़ पे और एक शरर पर रक्खा
अब्बास ताबिश
दिल दुखों के हिसार में आया
अब्बास ताबिश
दश्त-ए-हैरत में सबील-ए-तिश्नगी बन जाइए
अब्बास ताबिश
दर-ए-उफ़ुक़ पे रक़म रौशनी का बाब करें
अब्बास ताबिश
दम-ए-सुख़न ही तबीअ'त लहू लहू की जाए
अब्बास ताबिश
दहन खोलेंगी अपनी सीपियाँ आहिस्ता आहिस्ता
अब्बास ताबिश
चश्म-ए-नम-दीदा सही ख़ित्ता-ए-शादाब मिरा
अब्बास ताबिश
चराग़-ए-सुब्ह जला कोई ना-शनासी में
अब्बास ताबिश
बहुत बे-कार मौसम है मगर कुछ काम करना है
अब्बास ताबिश
बदन के चाक पर ज़र्फ़-ए-नुमू तय्यार करता हूँ
अब्बास ताबिश
अजीब तौर की है अब के सरगिरानी मिरी
अब्बास ताबिश
आँख पे पट्टी बाँध के मुझ को तन्हा छोड़ दिया है
अब्बास ताबिश
क्या करूँ ख़िलअत ओ दस्तार की ख़्वाहिश कि मुझे
अब्बास रिज़वी
एक ना-तवाँ रिश्ता उस से अब भी बाक़ी है
अब्बास रिज़वी
बहुत अज़ीज़ थी ये ज़िंदगी मगर हम लोग
अब्बास रिज़वी
सितारे चाहते हैं माहताब माँगते हैं
अब्बास रिज़वी
जिस को हम समझते थे उम्र भर का रिश्ता है
अब्बास रिज़वी
जब कोई तीर हवादिस की कमाँ से आया
अब्बास रिज़वी
हम तिरे हुस्न-ए-जहाँ-ताब से डर जाते हैं
अब्बास रिज़वी
गुज़र गया वो ज़माना वो ज़ख़्म भर भी गए
अब्बास रिज़वी
धुआँ सा फैल गया दिल में शाम ढलते ही
अब्बास रिज़वी