Hope Poetry (page 82)

एक रात की कहानी

फ़हमीदा रियाज़

दिल्ली तिरी छाँव…

फ़हमीदा रियाज़

चादर और चार-दीवारी

फ़हमीदा रियाज़

बैठा है मेरे सामने वो

फ़हमीदा रियाज़

अब सो जाओ

फ़हमीदा रियाज़

चार-सू है बड़ी वहशत का समाँ

फ़हमीदा रियाज़

उसे ले कर जो गाड़ी जा चुकी है

फ़हमी बदायूनी

आप तशरीफ़ लाए थे इक रोज़

फ़हमी बदायूनी

नहीं हो तुम तो ऐसा लग रहा है

फ़हमी बदायूनी

मौत की सम्त जान चलती रही

फ़हमी बदायूनी

कोई मिलता नहीं ख़ुदा की तरह

फ़हमी बदायूनी

जाहिलों को सलाम करना है

फ़हमी बदायूनी

उसी ने चाँद के पहलू में इक चराग़ रखा

फ़हीम शनास काज़मी

तेरी गली के मोड़ पे पहुँचे थे जल्द हम

फ़हीम शनास काज़मी

ज़िंदगी से मुकालिमा

फ़हीम शनास काज़मी

सारबाँ

फ़हीम शनास काज़मी

सब्र की चादर तह कर दी

फ़हीम शनास काज़मी

राहदारी में गूँजती नज़्म

फ़हीम शनास काज़मी

''ला'' भी है एक गुमाँ

फ़हीम शनास काज़मी

ख़ुद-कुशी के पुल पर

फ़हीम शनास काज़मी

देर हो गई

फ़हीम शनास काज़मी

और ख़ुदा ख़ामोश था

फ़हीम शनास काज़मी

समझ रहा था मैं ये दिन गुज़रने वाला नहीं

फ़हीम शनास काज़मी

रस्ते में शाम हो गई क़िस्सा तमाम हो चुका

फ़हीम शनास काज़मी

हम एक दिन निकल आए थे ख़्वाब से बाहर

फ़हीम शनास काज़मी

दिल-ए-तबाह को अब तक नहीं यक़ीं आया

फ़हीम शनास काज़मी

बर्ग-ए-सदा को लब से उड़े देर हो गई

फ़हीम शनास काज़मी

बदन को ख़ाक किया और लहू को आब किया

फ़हीम शनास काज़मी

लफ़्ज़ का बस है तअ'ल्लुक़ मेरे तेरे दरमियाँ

फ़हीम आज़मी

तुझ बिना दिल को बे-क़रारी है

फ़ाएज़ देहलवी