Islamic Poetry (page 66)
उन्हें निगाह है अपने जमाल ही की तरफ़
अकबर इलाहाबादी
साँस लेते हुए भी डरता हूँ
अकबर इलाहाबादी
सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ और चुनीं रही
अकबर इलाहाबादी
रंग-ए-शराब से मिरी निय्यत बदल गई
अकबर इलाहाबादी
न रूह-ए-मज़हब न क़ल्ब-ए-आरिफ़ न शाइराना ज़बान बाक़ी
अकबर इलाहाबादी
न बहते अश्क तो तासीर में सिवा होते
अकबर इलाहाबादी
मज़हब का हो क्यूँकर इल्म-ओ-अमल दिल ही नहीं भाई एक तरफ़
अकबर इलाहाबादी
क्या जानिए सय्यद थे हक़ आगाह कहाँ तक
अकबर इलाहाबादी
ख़ुशी है सब को कि ऑपरेशन में ख़ूब निश्तर ये चल रहा है
अकबर इलाहाबादी
ख़ुदा अलीगढ़ की मदरसे को तमाम अमराज़ से शिफ़ा दे
अकबर इलाहाबादी
कहाँ वो अब लुत्फ़-ए-बाहमी है मोहब्बतों में बहुत कमी है
अकबर इलाहाबादी
जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श का शैदा होगा
अकबर इलाहाबादी
जल्वा अयाँ है क़ुदरत-ए-परवरदिगार का
अकबर इलाहाबादी
जब यास हुई तो आहों ने सीने से निकलना छोड़ दिया
अकबर इलाहाबादी
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
अकबर इलाहाबादी
हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए
अकबर इलाहाबादी
हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
अकबर इलाहाबादी
ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता
अकबर इलाहाबादी
गले लगाएँ करें प्यार तुम को ईद के दिन
अकबर इलाहाबादी
फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं
अकबर इलाहाबादी
इक बोसा दीजिए मिरा ईमान लीजिए
अकबर इलाहाबादी
दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
अकबर इलाहाबादी
दिल मिरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला
अकबर इलाहाबादी
दिल हो ख़राब दीन पे जो कुछ असर पड़े
अकबर इलाहाबादी
दर्द तो मौजूद है दिल में दवा हो या न हो
अकबर इलाहाबादी
चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहीं
अकबर इलाहाबादी
अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए
अकबर इलाहाबादी
ये शौक़ सारे यक़ीन-ओ-गुमाँ से पहले था
अकबर अली खान अर्शी जादह
तुम्हारे दिल की तरह ये ज़मीन तंग नहीं
अकबर अली खान अर्शी जादह
सज़ा है किस के लिए और जज़ा है किस के लिए
अकबर अली खान अर्शी जादह