Love Poetry (page 187)
इक बेवफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया
बहज़ाद लखनवी
दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
बहज़ाद लखनवी
चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है
बहज़ाद लखनवी
ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
बहज़ाद लखनवी
कुछ बे-अदबी और शब-ए-वस्ल नहीं की
बेगम लखनवी
बरसों ग़म-ए-गेसू में गिरफ़्तार तो रक्खा
बेगम लखनवी
रात को रोज़ डूब जाता है
बेदिल हैदरी
मेरे अंदर का पाँचवाँ मौसम
बेदिल हैदरी
भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे
बेदिल हैदरी
रहने दे रतजगों में परेशाँ मज़ीद उसे
बेदिल हैदरी
मिरी दास्तान-ए-अलम तो सुन कोई ज़लज़ला नहीं आएगा
बेदिल हैदरी
हम तुम में कल दूरी भी हो सकती है
बेदिल हैदरी
दरिया ने कल जो चुप का लिबादा पहन लिया
बेदिल हैदरी
भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे
बेदिल हैदरी
अन-कही को कही बनाना है
बेदिल हैदरी
किरन में फिर से बदलने लगा ख़याल उस का
बेदार सरमदी
तौर मजनूँ की निगाहों के बताते हैं हमें
बेदम शाह वारसी
हमारी ज़िंदगी तो मुख़्तसर सी इक कहानी थी
बेदम शाह वारसी
बेदम ये मोहब्बत है या कोई मुसीबत है
बेदम शाह वारसी
अब आदमी कुछ और हमारी नज़र में है
बेदम शाह वारसी
ये साक़ी की करामत है कि फ़ैज़-ए-मय-परस्ती है
बेदम शाह वारसी
ये ख़ुसरवी-ओ-शौकत-ए-शाहाना मुबारक
बेदम शाह वारसी
उस को दुनिया और न उक़्बा चाहिए
बेदम शाह वारसी
तूर वाले तिरी तनवीर लिए बैठे हैं
बेदम शाह वारसी
तेरी उल्फ़त शोबदा-पर्वाज़ है
बेदम शाह वारसी
सीने में दिल है दिल में दाग़ दाग़ में सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़
बेदम शाह वारसी
शादी ओ अलम सब से हासिल है सुबुकदोशी
बेदम शाह वारसी
सहारा मौजों का ले ले के बढ़ रहा हूँ मैं
बेदम शाह वारसी
क़स्र-ए-जानाँ तक रसाई हो किसी तदबीर से
बेदम शाह वारसी
क़फ़स की तीलियों से ले के शाख़-ए-आशियाँ तक है
बेदम शाह वारसी