Love Poetry (page 259)
आश्ना होते ही उस इश्क़ ने मारा मुझ को
अरशद अली ख़ान क़लक़
आशिक़-ए-गेसू-ओ-क़द तेरे गुनहगार हैं सब
अरशद अली ख़ान क़लक़
आरिज़ में तुम्हारे क्या सफ़ा है
अरशद अली ख़ान क़लक़
आएँगे वो तो आप में हरगिज़ न आएँगे
अरशद अली ख़ान क़लक़
सुख़न के चाक में पिन्हाँ तुम्हारी चाहत है
अरशद अब्दुल हमीद
इश्क़ मरहून-ए-हिकायात-ओ-गुमाँ भी होगा
अरशद अब्दुल हमीद
सुख़न के चाक में पिन्हाँ तुम्हारी चाहत है
अरशद अब्दुल हमीद
शर्त-ए-दीवार-ओ-दर-ओ-बाम उठा दी है तो क्या
अरशद अब्दुल हमीद
मुझ को तक़दीर ने यूँ बे-सर-ओ-आसार किया
अरशद अब्दुल हमीद
मुझ सा बेताब यहाँ कोई नहीं मेरे सिवा
अरशद अब्दुल हमीद
मिले जो उस से तो यादों के पर निकल आए
अरशद अब्दुल हमीद
मिरे ख़ेमे ख़स्ता-हाल में हैं मिरे रस्ते धुँद के जाल में हैं
अरशद अब्दुल हमीद
मेरे अशआर तमव्वुज पे जो आए हुए हैं
अरशद अब्दुल हमीद
मेहर ओ महताब को मेरे ही निशाँ जानती है
अरशद अब्दुल हमीद
लकीर-ए-संग को अन्क़ा-मिसाल हम ने किया
अरशद अब्दुल हमीद
जुनूँ के तौर हम इदराक ही से बाँधते हैं
अरशद अब्दुल हमीद
इश्क़ मरहून-ए-हिकायात-ओ-गुमाँ भी होगा
अरशद अब्दुल हमीद
है टोंक अर्ज़-ए-पाक वहीं से उठेंगे हम
अरशद अब्दुल हमीद
घटाएँ घिरती हैं बिजली कड़क के गिरती है
अरशद अब्दुल हमीद
फ़सील-ए-सब्र में रौज़न बनाना चाहती है
अरशद अब्दुल हमीद
चिराग़-ए-दर्द कि शम-ए-तरब पुकारती है
अरशद अब्दुल हमीद
ज़माने भर ने कहा 'अर्श' जो, ख़ुशी से सहा
अर्श सिद्दीक़ी
ज़ंजीर से उठती है सदा सहमी हुई सी
अर्श सिद्दीक़ी
वक़्त का झोंका जो सब पत्ते उड़ा कर ले गया
अर्श सिद्दीक़ी
संग-ए-दर उस का हर इक दर पे लगा मिलता है
अर्श सिद्दीक़ी
फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं
अर्श सिद्दीक़ी
मैं आलम-ए-इम्काँ में जिसे ढूँढ रहा हूँ
अर्श सिद्दीक़ी
क्या साथ तिरा दूँ कि मैं इक मौज-ए-हवा हूँ
अर्श सिद्दीक़ी
हम हद-ए-इंदिमाल से भी गए
अर्श सिद्दीक़ी
हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूर-ए-वफ़ा है
अर्श सिद्दीक़ी