Love Poetry (page 260)
ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे
अर्श सिद्दीक़ी
दरवाज़ा तिरे शहर का वा चाहिए मुझ को
अर्श सिद्दीक़ी
बंद आँखों से न हुस्न-ए-शब का अंदाज़ा लगा
अर्श सिद्दीक़ी
बैठा हूँ वक़्फ़-ए-मातम-ए-हस्ती मिटा हुआ
अर्श सिद्दीक़ी
अज़ाब-ए-बे-दिली-ए-जान-ए-मुब्तला न गया
अर्श सिद्दीक़ी
ज़िंदगी कुछ सोज़ है कुछ साज़ है
अर्श सहबाई
ये देखें राज़-ए-दिल अब कौन करता है अयाँ पहले
अर्श सहबाई
ये आइना था मगर ग़म की रहगुज़ार में था
अर्श सहबाई
उन से इज़हार-ए-शिकायत करूँ या न करूँ
अर्श सहबाई
नूर-अफ़शाँ है वो ज़ुल्मत में उजालों की तरह
अर्श सहबाई
मस्ती-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम से वाबस्ता रही
अर्श सहबाई
कश्ती-ए-दिल नज़्र-ए-तूफ़ाँ हो गई
अर्श सहबाई
हज़ार हादसात-ए-ग़म रवाँ-दवाँ लिए हुए
अर्श सहबाई
हंगामा-हा-ए-बादा-ओ-पैमाना देख कर
अर्श सहबाई
दिल-ए-मुज़्तर से नालाँ हैं उधर वो भी इधर हम भी
अर्श सहबाई
तौबा तौबा ये बला-ख़ेज़ जवानी तौबा
अर्श मलसियानी
साक़ी मिरी ख़मोश-मिज़ाजी की लाज रख
अर्श मलसियानी
मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है
अर्श मलसियानी
मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं
अर्श मलसियानी
ख़ुश्क बातों में कहाँ है शैख़ कैफ़-ए-ज़िंदगी
अर्श मलसियानी
जितनी वो मिरे हाल पे करते हैं जफ़ाएँ
अर्श मलसियानी
इस इंतिहा-ए-तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद
अर्श मलसियानी
हुस्न हर हाल में है हुस्न परागंदा नक़ाब
अर्श मलसियानी
चमन में कौन है पुरसान-ए-हाल शबनम का
अर्श मलसियानी
बला है क़हर है आफ़त है फ़ित्ना है क़यामत है
अर्श मलसियानी
मेरे प्यारे वतन
अर्श मलसियानी
मैं क्यूँ भूल जाऊँ
अर्श मलसियानी
जश्न-ए-आज़ादी
अर्श मलसियानी
दीवाली
अर्श मलसियानी
15 अगस्त (1949)
अर्श मलसियानी