Love Poetry (page 261)
ज़ख़्म-ए-दिल भी दिखा के देख लिया
अर्श मलसियानी
ये दुनिया है उसे दार-उल-फ़ितन कहना ही पड़ता है
अर्श मलसियानी
वो ले के हौसला-ए-अज़्म-ए-बे-पनाह चले
अर्श मलसियानी
तू अगर दिल में एक बार आए
अर्श मलसियानी
रहगुज़र रहगुज़र से पूछ लिया
अर्श मलसियानी
पहला सा वो जुनून-ए-मोहब्बत नहीं रहा
अर्श मलसियानी
नैरंगी-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ देखते रहे
अर्श मलसियानी
मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है
अर्श मलसियानी
लुत्फ़ ही लुत्फ़ है जो कुछ है इनायत के सिवा
अर्श मलसियानी
ख़ाना-ए-दिल में दाग़ जल न सका
अर्श मलसियानी
जिस में हो दोज़ख़ का डर क्या लुत्फ़ उस जीने में है
अर्श मलसियानी
इश्क़-ए-बुताँ का ले के सहारा कभी कभी
अर्श मलसियानी
हुस्न पर दस्तरस की बात न कर
अर्श मलसियानी
एहसास-ए-हुस्न बन के नज़र में समा गए
अर्श मलसियानी
दिल-ए-फ़सुर्दा पे सौ बार ताज़गी आई
अर्श मलसियानी
अगर तक़दीर तेरी बाइस-ए-आज़ार हो जाए
अर्श मलसियानी
आग ही आग है गुलशन ये कोई क्या जाने
अर्श मलसियानी
हिना-रंग हाथों में
अरमान नज्मी
पिछली रफ़ाक़तों का न इतना मलाल कर
अरमान नज्मी
निगाह-ए-तिश्ना से हैरत का बाब देखते हैं
अरमान नज्मी
नज़र के सामने सहरा-ए-बे-पनाही है
अरमान नज्मी
न हर्फ़-ए-शौक़ न तर्ज़-ए-बयाँ से आती है
अरमान नज्मी
कभी तो आ के मिलो मेरा हाल तो पूछो
अरमान नज्मी
गुज़रते दिन के दुखों का पता तो देता था
अरमान नज्मी
गिरते उभरते डूबते धारे से कट गया
अरमान नज्मी
घनी आबादियों की बे-अमानी का तमाशा कर
अरमान नज्मी
इक बे-निशान हर्फ़-ए-सदा की तरफ़ न देख
अरमान नज्मी
दिमाग़-ओ-दिल पे हो क्या असर अँधेरे का
अरमान नज्मी
ब-ज़ाहिर ये वही मिलने बिछड़ने की हिकायत है
अरमान नज्मी
अपनी सच्चाई का आज़ार जो पाले हुए हैं
अरमान नज्मी