Love Poetry (page 83)
दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं
हबीब जालिब
दयार-ए-'दाग़'-ओ-'बेख़ुद' शहर-ए-देहली छोड़ कर तुझ को
हबीब जालिब
दरख़्त सूख गए रुक गए नदी नाले
हबीब जालिब
चूर था ज़ख़्मों से दिल ज़ख़्मी जिगर भी हो गया
हबीब जालिब
बहुत रौशन है शाम-ए-ग़म हमारी
हबीब जालिब
और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
हबीब जालिब
और सब भूल गए हर्फ़ सदाक़त लिखना
हबीब जालिब
अब तेरी ज़रूरत भी बहुत कम है मिरी जाँ
हबीब जालिब
आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह
हबीब जालिब
नफ़स नफ़स न कहीं जाए राएगाँ अपना
हबीब राहत हबाब
तालिब-ए-बोसा हूँ मैं क़ासिद वो हैं ख़्वाहान-ए-जान
हबीब मूसवी
मय-कदे को जा के देख आऊँ ये हसरत दिल में है
हबीब मूसवी
लब-ए-जाँ-बख़्श तक जा कर रहे महरूम बोसा से
हबीब मूसवी
ग़ुर्बत बस अब तरीक़-ए-मोहब्बत को क़त्अ कर
हबीब मूसवी
चाँदनी छुपती है तकयों के तले आँखों में ख़्वाब
हबीब मूसवी
बुतान-ए-सर्व-क़ामत की मोहब्बत में न फल पाया
हबीब मूसवी
बरहमन शैख़ को कर दे निगाह-ए-नाज़ उस बुत की
हबीब मूसवी
बहुत दिनों में वो आए हैं वस्ल की शब है
हबीब मूसवी
वो यूँ शक्ल-ए-तर्ज़-ए-बयाँ खींचते हैं
हबीब मूसवी
वो उट्ठे हैं तेवर बदलते हुए
हबीब मूसवी
शराब पी जान तन में आई अलम से था दिल कबाब कैसा
हबीब मूसवी
शब को नाला जो मिरा ता-ब-फ़लक जाता है
हबीब मूसवी
शब कि मुतरिब था शराब-ए-नाब थी पैमाना था
हबीब मूसवी
रोना इन का काम है हर दम जल जल कर मर जाना भी
हबीब मूसवी
मेहर-ओ-उल्फ़त से मआल-ए-तहज़ीब
हबीब मूसवी
लैस हो कर जो मिरा तर्क-ए-जफ़ा-कार चले
हबीब मूसवी
कोई बात ऐसी आज ऐ मेरी गुल-रुख़्सार बन जाए
हबीब मूसवी
किसी की जुब्बा-साई से कभी घिसता नहीं पत्थर
हबीब मूसवी
जबीन पर क्यूँ शिकन है ऐ जान मुँह है ग़ुस्से से लाल कैसा
हबीब मूसवी
जब शाम हुई दिल घबराया लोग उठ के बराए सैर चले
हबीब मूसवी