Love Poetry (page 84)

हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है

हबीब मूसवी

है निगहबाँ रुख़ का ख़ाल-रू-ए-दोस्त

हबीब मूसवी

है नौ-जवानी में ज़ोफ़-ए-पीरी बदन में रअशा कमर में ख़म है

हबीब मूसवी

है आठ पहर तू जल्वा-नुमा तिमसाल-ए-नज़र है परतव-ए-रुख़

हबीब मूसवी

गुलों का दौर है बुलबुल मज़े बहार में लूट

हबीब मूसवी

फ़िराक़ में दम उलझ रहा है ख़याल-ए-गेसू में जांकनी है

हबीब मूसवी

फ़रियाद भी मैं कर न सका बे-ख़बरी से

हबीब मूसवी

फ़लक की गर्दिशें ऐसी नहीं जिन में क़दम ठहरे

हबीब मूसवी

देख लो तुम ख़ू-ए-आतिश ऐ क़मर शीशे में है

हबीब मूसवी

दाग़-ए-दिल हैं ग़ैरत-ए-सद-लाला-ज़ार अब के बरस

हबीब मूसवी

चल नहीं सकते वहाँ ज़ेहन-ए-रसा के जोड़-तोड़

हबीब मूसवी

भला हो जिस काम में किसी का तो उस में वक़्फ़ा न कीजिएगा

हबीब मूसवी

बना के आईना-ए-तसव्वुर जहाँ दिल-ए-दाग़-दार देखा

हबीब मूसवी

बढ़ा दी इक नज़र में तू ने क्या तौक़ीर पत्थर की

हबीब मूसवी

अक़्ल पर पत्थर पड़े उल्फ़त में दीवाना हुआ

हबीब मूसवी

तुझ से उम्मीद क्या लगा बैठे

हबीब कैफ़ी

जिस को देखो शाम-सवेरे बे-कल है

हबीब कैफ़ी

गर मैं नहीं तो दर्द का पैकर कोई तो है

हबीब कैफ़ी

'हबीब' इस ज़िंदगी के पेच-ओ-ख़म से हम भी नालाँ हैं

हबीब हैदराबादी

दिल-ए-तन्हा में अब एहसास-ए-महरूमी नहीं शायद

हबीब हैदराबादी

ये कैफ़ कैफ़-ए-मोहब्बत है कोई क्या जाने

हबीब अशअर देहलवी

तौर बे-तौर हुए जाते हैं

हबीब अशअर देहलवी

पहलू में इक नई सी ख़लिश पा रहा हूँ मैं

हबीब अशअर देहलवी

मौज-ए-अन्फ़ास भी इक तेग़-ए-रवाँ हो जैसे

हबीब अशअर देहलवी

जो मिरे दिल में आह हो के रही

हबीब अशअर देहलवी

या दैर है या काबा है या कू-ए-बुताँ है

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

वो करम हो कि सितम एक तअल्लुक़ है ज़रूर

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

वो भला कैसे बताए कि ग़म-ए-हिज्र है क्या

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

निगाह-ए-लुत्फ़ को उल्फ़त-शिआर समझे थे

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

कितने सनम ख़ुद हम ने तराशे

हबीब अहमद सिद्दीक़ी