Love Poetry (page 88)
फूल ने टहनी से उड़ने की कोशिश की
गुलज़ार
ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर
गुलज़ार
मुझे अँधेरे में बे-शक बिठा दिया होता
गुलज़ार
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
गुलज़ार
कोई अटका हुआ है पल शायद
गुलज़ार
ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
गुलज़ार
काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी
गुलज़ार
जब भी ये दिल उदास होता है
गुलज़ार
जब भी आँखों में अश्क भर आए
गुलज़ार
हम तो कितनों को मह-जबीं कहते
गुलज़ार
हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए
गुलज़ार
एक परवाज़ दिखाई दी है
गुलज़ार
दर्द हल्का है साँस भारी है
गुलज़ार
बीते रिश्ते तलाश करती है
गुलज़ार
बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद
गुलज़ार
ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता
गुलज़ार
उठो गले से लिपट जाओ फिर निखर लेना
गुलशनुद्दौला बहार
न कोई दीन होता है न कोई ज़ात होती है
गुलशन बरेलवी
याद नहीं है
गुलनाज़ कौसर
वहम नहीं है
गुलनाज़ कौसर
रात हर बार लिए
गुलनाज़ कौसर
मैं नहीं हूँ मगर
गुलनाज़ कौसर
किसी की याद का चेहरा
गुलनाज़ कौसर
हयात-ए-रवाँ
गुलनाज़ कौसर
बम धमाका
गुलनाज़ कौसर
ये तिलिस्म-ए-मौसम-ए-गुल नहीं कि ये मोजज़ा है बहार का
गुलनार आफ़रीन
एक आँसू याद का टपका तो दरिया बन गया
गुलनार आफ़रीन
दिल का हर ज़ख़्म तिरी याद का इक फूल बने
गुलनार आफ़रीन
याद करने का तुम्हें कोई इरादा भी न था
गुलनार आफ़रीन
वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा
गुलनार आफ़रीन