Sad Poetry (page 114)
में इक गाँव का शाएर हूँ
फ़ारूक़ नाज़की
मशवरा देने की कोशिश तो करो
फ़ारूक़ नाज़की
मशवरा देने की कोशिश तो करो
फ़ारूक़ नाज़की
जब भी तुम को सोचा है
फ़ारूक़ नाज़की
ग़म की चादर ओढ़ कर सोए थे क्या
फ़ारूक़ नाज़की
गहरी नीली शाम का मंज़र लिखना है
फ़ारूक़ नाज़की
दर्द की रात गुज़रती है मगर आहिस्ता
फ़ारूक़ नाज़की
बस्ती से दूर जा के कोई रो रहा है क्यूँ
फ़ारूक़ नाज़की
ऐ मरकज़-ए-ख़याल बिखरने लगा हूँ मैं
फ़ारूक़ नाज़की
ए मरकज़-ए-ख़याल बिखरने लगा हूँ में
फ़ारूक़ नाज़की
शहर
फ़ारूक़ मुज़्तर
सब्ज़ आग़ाज़ से सुर्ख़ अंजाम तक
फ़ारूक़ मुज़्तर
यूँ हुजरा-ए-ख़याल में बैठा हुआ हूँ मैं
फ़ारूक़ मुज़्तर
ये गर्द-ए-राह ये माहौल ये धुआँ जैसे
फ़ारूक़ मुज़्तर
उजले माथे पे नाम लिख रक्खें
फ़ारूक़ मुज़्तर
सोच भी उस दिन को जब तू ने मुझे सोचा न था
फ़ारूक़ मुज़्तर
सलीब-ए-मौजा-ए-आब-ओ-हवा पे लिक्खा हूँ
फ़ारूक़ मुज़्तर
नक़्श आख़िर आप अपना हादिसा हो जाएगा
फ़ारूक़ मुज़्तर
न पानियों का इज़्तिरार शहर में
फ़ारूक़ मुज़्तर
मैं ताइर-ए-वजूद या बर्ग-ए-ख़याल था
फ़ारूक़ मुज़्तर
हर नए मोड़ धूप का सहरा
फ़ारूक़ मुज़्तर
अपनी आँखों के हिसारों से निकल कर देखना
फ़ारूक़ मुज़्तर
आँखों में मौज मौज कोई सोचने लगा
फ़ारूक़ मुज़्तर
सितारों से शब-ए-ग़म का तो दामन जगमगा उठ्ठा
फ़ारूक़ बाँसपारी
ग़म-ए-इश्क़ ही ने काटी ग़म-ए-इश्क़ की मुसीबत
फ़ारूक़ बाँसपारी
तुम्हारे क़स्र-आज़ादी के मेमारों ने क्या पाया
फ़ारूक़ बाँसपारी
कोहसार का ख़ूगर है न पाबंद-ए-गुलिस्ताँ
फ़ारूक़ बाँसपारी
ख़ुशी से फूलें न अहल-ए-सहरा अभी कहाँ से बहार आई
फ़ारूक़ बाँसपारी
कभी बे-नियाज़-ए-मख़्ज़न कभी दुश्मन-ए-किनारा
फ़ारूक़ बाँसपारी
जो रहा यूँ ही सलामत मिरा जज़्ब-ए-वालहाना
फ़ारूक़ बाँसपारी