Sad Poetry (page 116)
हमारे कमरे में पत्तियों की महक ने
फरीहा नक़वी
एक पुराना ख़्वाब
फरीहा नक़वी
उसे भूलने का सितम कर रहे हैं
फरीहा नक़वी
तुम्हें पाने की हैसिय्यत नहीं है
फरीहा नक़वी
शनासाई का सिलसिला देखती हूँ
फरीहा नक़वी
लाख दिल ने पुकारना चाहा
फरीहा नक़वी
क्यूँ दिया था? बता! मेरी वीरानियों में सहारा मुझे
फरीहा नक़वी
हम तोहफ़े में घड़ियाँ तो दे देते हैं
फरीहा नक़वी
बीते ख़्वाब की आदी आँखें कौन उन्हें समझाए
फरीहा नक़वी
ऐ मिरी ज़ात के सुकूँ आ जा
फरीहा नक़वी
यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा
फ़ारिग़ बुख़ारी
याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए
फ़ारिग़ बुख़ारी
पुकारा जब मुझे तन्हाई ने तो याद आया
फ़ारिग़ बुख़ारी
नई मंज़िल का जुनूँ तोहमत-ए-गुमराही है
फ़ारिग़ बुख़ारी
हम एक फ़िक्र के पैकर हैं इक ख़याल के फूल
फ़ारिग़ बुख़ारी
अपने दरिया की प्यास
फ़ारिग़ बुख़ारी
यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा
फ़ारिग़ बुख़ारी
यादों का अजीब सिलसिला है
फ़ारिग़ बुख़ारी
याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रोज़-ओ-शब भी नहीं हैं वो रंग-ओ-बू भी नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रोज़-ओ-शब भी नहीं है वो रंग-ओ-बू भी नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रौशनी है कहाँ जिस के बाद साया नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
नश्शे में जो है कोहना शराबों से ज़ियादा
फ़ारिग़ बुख़ारी
मसीह-ए-वक़्त सही हम को उस से क्या लेना
फ़ारिग़ बुख़ारी
मैं शो'ला-ए-इज़हार हूँ कोताह हूँ क़द तक
फ़ारिग़ बुख़ारी
मैं कि अब तेरी ही दीवार का इक साया हूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
क्या अदू क्या दोस्त सब को भा गईं रुस्वाइयाँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
कुछ नहीं गरचे तिरी राहगुज़र से आगे
फ़ारिग़ बुख़ारी
कितने शिकवे गिले हैं पहले ही
फ़ारिग़ बुख़ारी
जंगल उगा था हद्द-ए-नज़र तक सदाओं का
फ़ारिग़ बुख़ारी