Sad Poetry (page 117)

इस औज पर न उछालो मुझे हवा कर के

फ़ारिग़ बुख़ारी

हुए हैं सर्द दिमाग़ों के दहके दहके अलाव

फ़ारिग़ बुख़ारी

हर एक रास्ते का हम-सफ़र रहा हूँ मैं

फ़ारिग़ बुख़ारी

दो घड़ी बैठे थे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं की छाँव में

फ़ारिग़ बुख़ारी

दिल के घाव जब आँखों में आते हैं

फ़ारिग़ बुख़ारी

देखे कोई जो चाक-ए-गरेबाँ के पार भी

फ़ारिग़ बुख़ारी

देखा तुझे तो आँखों ने ऐवाँ सजा लिए

फ़ारिग़ बुख़ारी

चाँदनी ने रात का मौसम जवाँ जैसे किया

फ़ारिग़ बुख़ारी

चाँदनी ने रात का मौसम जवाँ जैसे किया

फ़ारिग़ बुख़ारी

अपने ही साए में था में शायद छुपा हुआ

फ़ारिग़ बुख़ारी

लाख रहे शहरों में फिर भी अंदर से देहाती थे

फ़रहत ज़ाहिद

औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ

फ़रहत ज़ाहिद

सौत क्या शय है ख़ामुशी क्या है

फ़रहत शहज़ाद

हम से तंहाई के मारे नहीं देखे जाते

फ़रहत शहज़ाद

अज़ीज़ मुझ को हैं तूफ़ान साहिलों से सिवा

फ़रहत शहज़ाद

ये ज़मीं ख़्वाब है आसमाँ ख़्वाब है

फ़रहत शहज़ाद

शाम कहती है कोई बात जुदा सी लिक्खूँ

फ़रहत शहज़ाद

सौत क्या शय है ख़ामुशी क्या है

फ़रहत शहज़ाद

नहीं है अब कोई रस्ता नहीं है

फ़रहत शहज़ाद

मैं अपने-आप से बरहम था वो ख़फ़ा मुझ से

फ़रहत शहज़ाद

जब तक चराग़-ए-शाम-ए-तमन्ना जले चलो

फ़रहत शहज़ाद

हम से तंहाई के मारे नहीं देखे जाते

फ़रहत शहज़ाद

दश्त-ए-वहशत ने फिर पुकारा है

फ़रहत शहज़ाद

आँख को जकड़े थे कल ख़्वाब अज़ाबों के

फ़रहत शहज़ाद

वो खुल कर मुझ से मिलता भी नहीं है

फ़रहत क़ादरी

था पा-शिकस्ता आँख मगर देखती तो थी

फ़रहत क़ादरी

शुऊर-ओ-फ़िक्र की तज्दीद का गुमाँ तो हुआ

फ़रहत क़ादरी

राज़ उबल पड़े आख़िर आसमाँ के सीनों से

फ़रहत क़ादरी

रातों के अंधेरों में ये लोग अजब निकले

फ़रहत क़ादरी

कोई धड़कन कोई उलझन कोई बंधन माँगे

फ़रहत क़ादरी