Sad Poetry (page 119)
हिज्र ओ विसाल चराग़ हैं दोनों तन्हाई के ताक़ों में
फ़रहत एहसास
हमारा ज़िंदा रहना और मरना एक जैसा है
फ़रहत एहसास
दो अलग लफ़्ज़ नहीं हिज्र ओ विसाल
फ़रहत एहसास
ऐ सदफ़ सुन तुझे फिर याद दिला देता हूँ
फ़रहत एहसास
आँखों की प्यालियों में बारिश मची हुई है
फ़रहत एहसास
सुकूत
फ़रहत एहसास
शेर कह लेने के बाद
फ़रहत एहसास
साँप
फ़रहत एहसास
ख़ुद-आगही
फ़रहत एहसास
गुनाहों की धुँद
फ़रहत एहसास
दुनिया को कहाँ तक जाना है
फ़रहत एहसास
बिछड़े घर का साया
फ़रहत एहसास
अगर मैं चीख़ूँ
फ़रहत एहसास
ज़मीं से अर्श तलक सिलसिला हमारा भी था
फ़रहत एहसास
ज़मीं ने लफ़्ज़ उगाया नहीं बहुत दिन से
फ़रहत एहसास
ये बाग़ ज़िंदा रहे ये बहार ज़िंदा रहे
फ़रहत एहसास
यही हिसाब-ए-मोहब्बत दोबारा कर के लाओ
फ़रहत एहसास
वो महफ़िलें पुरानी अफ़्साना हो रही हैं
फ़रहत एहसास
वस्ल की रात में हम रात में बह जाते हैं
फ़रहत एहसास
वहाँ मैं जाऊँ मगर कुछ मिरा भला भी तो हो
फ़रहत एहसास
उस तरफ़ तू तिरी यकताई है
फ़रहत एहसास
उधर वो दश्त-ए-मुसलसल इधर मुसलसल मैं
फ़रहत एहसास
तेरा भला हो तू जो समझता है मुझ को ग़ैर
फ़रहत एहसास
तन्हाई के आब-ए-रवाँ के साहिल पर बैठा हूँ मैं
फ़रहत एहसास
साँसें ना-हमवार मिरी
फ़रहत एहसास
सहरा के संगीन सफ़र में आब-रसानी कम न पड़े
फ़रहत एहसास
साहिब-ए-इश्क़ अब इतनी सी तो राहत मुझे दे
फ़रहत एहसास
सब ने'मतें हैं शहर में इंसान ही नहीं
फ़रहत एहसास
सब मिरा आब-ए-रवाँ किस के इशारों पे बहा जाता है
फ़रहत एहसास
रक़्स-ए-इल्हाम कर रहा हूँ
फ़रहत एहसास