Sad Poetry (page 118)
जितने लोग नज़र आते हैं सब के सब बेगाने हैं
फ़रहत क़ादरी
जब हर नज़र हो ख़ुद ही तजल्ली-नुमा-ए-ग़म
फ़रहत क़ादरी
आई ख़िज़ाँ चमन में गए दिन बहार के
फ़रहत क़ादरी
ये फुर्क़तों में लम्हा-ए-विसाल कैसे आ गया
फ़रहत नदीम हुमायूँ
न दौलत की तलब थी और न दौलत चाहिए है
फ़रहत नदीम हुमायूँ
मोहब्बत का ये रुख़ देखा नहीं था
फ़रहत नदीम हुमायूँ
मसअला आज मिरे इश्क़ का तू हल कर दे
फ़रहत नदीम हुमायूँ
कोई अहद-ए-वफ़ा भूला हुआ हूँ
फ़रहत नदीम हुमायूँ
है वही एक मेरे सिवा और मैं
फ़रहत नदीम हुमायूँ
हाल में जीने की तदबीर भी हो सकती है
फ़रहत नदीम हुमायूँ
हस्ती का राज़ क्या है ग़म-ए-हस्त-ओ-बूद है
फ़रहत कानपुरी
'फ़रहत' तिरे नग़मों की वो शोहरत है जहाँ में
फ़रहत कानपुरी
वो बहकी निगाहें क्या कहिए वो महकी जवानी क्या कहिए
फ़रहत कानपुरी
वस्ल के लम्हे कहानी हो गए
फ़रहत कानपुरी
तिरा जल्वा शाम-ओ-सहर देखते हैं
फ़रहत कानपुरी
मुँह-बोला बोल जगत का है जो मन में रहे सो अपना है
फ़रहत कानपुरी
मेरा दिल-ए-नाशाद जो नाशाद रहेगा
फ़रहत कानपुरी
कुछ तो वुफ़ूर-ए-शौक़ में बाइ'स-ए-इम्तियाज़ हो
फ़रहत कानपुरी
कोई भी हम-सफ़र नहीं होता
फ़रहत कानपुरी
जो कुछ भी है नज़र में सो वहम-ए-नुमूद है
फ़रहत कानपुरी
इक ख़लिश सी है मुझे तक़दीर से
फ़रहत कानपुरी
वो जो इक शोर सा बरपा है अमल है मेरा
फ़रहत एहसास
वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगा
फ़रहत एहसास
उसे ख़बर थी कि हम विसाल और हिज्र इक साथ चाहते हैं
फ़रहत एहसास
तिरे होंटों के सहरा में तिरी आँखों के जंगल में
फ़रहत एहसास
तभी वहीं मुझे उस की हँसी सुनाई पड़ी
फ़रहत एहसास
मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं
फ़रहत एहसास
किसी हालत में भी तन्हा नहीं होने देती
फ़रहत एहसास
कभी इस रौशनी की क़ैद से बाहर भी निकलो तुम
फ़रहत एहसास
जान ये सरकशी-ए-जिस्म तिरे बस की नहीं
फ़रहत एहसास