Sad Poetry (page 115)
दिल-ए-ईज़ा-तलब ले तेरा कहना कर लिया मैं ने
फ़ारूक़ बाँसपारी
वो बस्ती याद आती है
फ़ारूक़ बख़्शी
शिकायत
फ़ारूक़ बख़्शी
शहर-ए-दोस्त
फ़ारूक़ बख़्शी
जब हम पहली बार मिले थे
फ़ारूक़ बख़्शी
ये सौदा इश्क़ का आसान सा हे
फ़ारूक़ बख़्शी
वो न आएगा यहाँ वो नहीं आने वाला
फ़ारूक़ बख़्शी
वो ख़ुद अपना दामन बढ़ाने लगे
फ़ारूक़ बख़्शी
उस के होंटों पे बद-दुआ' भी नहीं
फ़ारूक़ बख़्शी
तमाम शहर में उस जैसा ख़स्ता-हाल न था
फ़ारूक़ बख़्शी
रेज़ा रेज़ा सा भला मुझ में बिखरता क्या हे
फ़ारूक़ बख़्शी
कैसे इन सच्चे जज़्बों की अब उस तक तफ़्हीम करूँ
फ़ारूक़ बख़्शी
जली हैं दर्द की शमएँ मगर अंधेरा है
फ़ारूक़ बख़्शी
जैसी ख़्वाहिश होती हे कब होता हे
फ़ारूक़ बख़्शी
इक पल कहीं रुके थे सफ़र याद आ गया
फ़ारूक़ बख़्शी
बिछड़ना मुझ से तो ख़्वाबों में सिलसिला रखना
फ़ारूक़ बख़्शी
यारों को क्या ढूँड रहे हो वक़्त की आँख-मिचोली में
फ़ारूक़ अंजुम
शहर की फ़सीलों पर ज़ख़्म जगमगाएँगे
फ़ारूक़ अंजुम
सब्ज़ मौसम की रिफ़ाक़त उस का कारोबार है
फ़ारूक़ अंजुम
परिंदे खेत में अब तक पड़ाव डाले हैं
फ़ारूक़ अंजुम
मैं मो'तबर हूँ इश्क़ मिरा मो'तबर नहीं
फ़ारूक़ अंजुम
ख़ाली नहीं है कोई यहाँ पर अज़ाब से
फ़ारूक़ अंजुम
जो बैठो सोचने हर ज़ख़्म-ए-दिल कसकता है
फ़ारूक़ अंजुम
अब धूप मुक़द्दर हुई छप्पर न मिलेगा
फ़ारूक़ अंजुम
मचलती है मिरे सीने में तेरी आरज़ू क्या क्या
फ़रोग़ हैदराबादी
इस क़दर महव-ए-तसव्वुर हूँ सितमगर तेरा
फ़रोग़ हैदराबादी
दिल नहीं मिलने का फिर मेरा सितमगर टूट कर
फ़रोग़ हैदराबादी
जन्म जन्म की कहानी
फ़रखंदा नसरीन हयात
मिरे हिज्र के फ़ैसले से डरो तुम
फरीहा नक़वी
भली क्यूँ लगे हम को ख़ुशियों की दस्तक
फरीहा नक़वी