Sad Poetry (page 112)
वो अपनी ज़ात में गुम था नहीं खुला मिरे साथ
फ़रताश सय्यद
वो अपनी ज़ात में गुम था नहीं खुला मेरे साथ
फ़रताश सय्यद
सर पे हर्फ़ आता है दस्तार पे हर्फ़ आता है
फ़रताश सय्यद
सफ़-ए-मातम पे जो हम नाचने गाने लग जाएँ
फ़रताश सय्यद
नख़्ल-ए-ममनूअा के रुख़ दोबारा गया मैं तो मारा गया
फ़रताश सय्यद
कीसा-ए-गुल में बंद थी ख़ुशबू
फ़रताश सय्यद
हम वफ़ादार हैं और इस से ज़ियादा क्या हों
फ़रताश सय्यद
हम हैं बस इज़्न-ए-सफ़र होने तक
फ़रताश सय्यद
दर-ए-फ़क़ीर पे जो आए वो दुआ ले जाए
फ़रताश सय्यद
तुम तो ख़ुद सहरा की सूरत बिखरे बिखरे लगते हो
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
दयार-ए-फ़िक्र-ओ-हुनर को निखारने वाला
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
तन्हा छोड़ के जाने वाले इक दिन पछताओगे
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
होश ओ ख़िरद गँवा के तिरे इंतिज़ार में
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
दयार-ए-फ़िक्र-ओ-हुनर को निखारने वाला
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
तिरे अद्ल के ऐवानों में
फर्रुख यार
मुझे खोल ताज़ा हवा में रख
फर्रुख यार
मालूम करो
फर्रुख यार
हम तो बस
फर्रुख यार
दिन गुज़र जाएगा
फर्रुख यार
अयाज़ चुप है
फर्रुख यार
यूँ मुसल्लत तो धुआँ जिस्म के अंदर तक है
फ़र्रुख़ जाफ़री
था अबस ख़ौफ़ कि आसेब-ए-गुमाँ मैं ही था
फ़र्रुख़ जाफ़री
तमाम फेंके गए पत्थरों पे भारी था
फ़र्रुख़ जाफ़री
सोचते रहने से क्या क़िस्मत का लिक्खा जाएगा
फ़र्रुख़ जाफ़री
किसी बहाने भी दिल से अलम नहीं जाता
फ़र्रुख़ जाफ़री
कटी पहाड़ सी शब इंतिज़ार करते हुए
फ़र्रुख़ जाफ़री
जाने क्या ऐसा उसे मुझ में नज़र आया था
फ़र्रुख़ जाफ़री
इस राज़ के बातिन तक पहुँचा ही नहीं कोई
फ़र्रुख़ जाफ़री
गो इस सफ़र में थक के बदन चूर हो गया
फ़र्रुख़ जाफ़री
अबस ही महव-ए-शब-ओ-रोज़ वो दुआ में था
फ़र्रुख़ जाफ़री