Sad Poetry (page 216)

दर्द की जोत मिरे दिल में जगाने वाले

असरा रिज़वी

बे-सबब ख़ौफ़ से दिल मेरा लरज़ता क्यूँ है

असरा रिज़वी

बालीदगी-ए-ज़र्फ़ पे दिखलाए गए लोग

असरा रिज़वी

ऐसा ये दर्द है कि भुलाया न जाएगा

असरा रिज़वी

अदावतों का ये उस को सिला दिया हम ने

असरा रिज़वी

तेरा सूरज आएगा

असलम राशिद

सुन कर कितनी आँखें निकलीं

असलम राशिद

सूख जाता है हर शजर मुझ में

असलम राशिद

मुझे दरिया बनाना चाहती है

असलम राशिद

है मुअम्मा या कहानी इश्क़ है

असलम राशिद

इक क़दम उठ गया रवानी में

असलम राशिद

यही नहीं कि किसी याद ने मलूल किया

असलम महमूद

वो दर्द हूँ कोई चारा नहीं है जिस का कहीं

असलम महमूद

देख आ कर कि तिरे हिज्र में भी ज़िंदा हैं

असलम महमूद

तू अपने शहर-ए-तरब से न पूछ हाल मिरा

असलम महमूद

सराब-ए-मअनी-ओ-मफ़्हूम में भटकते हैं

असलम महमूद

रंग सारे अपने अंदर रफ़्तगाँ के हैं

असलम महमूद

रात आती है तो ताक़ों में जलाते हैं चराग़

असलम महमूद

पत्थरों पर वादियों में नक़्श-ए-पा मेरा भी है

असलम महमूद

नए पैकर नए साँचे में ढलना चाहता हूँ मैं

असलम महमूद

न मलाल-ए-हिज्र न मुंतज़िर हैं हवा-ए-शाम-ए-विसाल के

असलम महमूद

मिज़ा पे ख़्वाब नहीं इंतिज़ार सा कुछ है

असलम महमूद

मैं हज्व इक अपने हर क़सीदे की रद में तहरीर कर रहा हूँ

असलम महमूद

मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया

असलम महमूद

क्यूँ मुझ से गुरेज़ाँ है मैं तेरा मुक़द्दर हूँ

असलम महमूद

किया गर्दिशों के हवाले उसे चाक पर रख दिया

असलम महमूद

जल रहा हूँ तो अजब रंग ओ समाँ है मेरा

असलम महमूद

देख के अर्ज़ां लहू सुर्ख़ी-ए-मंज़र ख़मोश

असलम महमूद

दश्त मरऊब है कितना मिरी वीरानी से

असलम महमूद

बुझ गए मंज़र उफ़ुक़ पर हर निशाँ मद्धम हुआ

असलम महमूद