Sad Poetry (page 215)

कैसे रफ़ू हों चाक-ए-गरेबाँ मैं भी सोचूँ तू भी सोच

असरारुल हक़ असरार

जानते थे ग़म तिरा दरिया भी था गहरा भी था

असरारुल हक़ असरार

ऐसी नई कुछ बात न होगी

असरारुल हक़ असरार

सुलग रहा हूँ ख़ुद अपनी ही आग में कब से

असरार ज़ैदी

अनजाने लोगों को हर सू चलता फिरता देख रहा हूँ

असरार ज़ैदी

मसरूफ़ हम भी अंजुमन-आराइयों में थे

असरार ज़ैदी

बरहनगी का मुदावा कोई लिबास न था

असरार ज़ैदी

अनजाने लोगों को हर सू चलता फिरता देख रहा हूँ

असरार ज़ैदी

आने वाली कल की दे कर ख़बर गया ये दिन भी

असरार ज़ैदी

तक़द्दुस-ए-मआब

असरार जामई

शैतान का फ़रमान

असरार जामई

शायर-ए-आज़म

असरार जामई

दिल्ली दर्शन

असरार जामई

चमचे की दुआ

असरार जामई

बिजली हुई फ़ेल

असरार जामई

पहचान ज़िंदगी की समझ कर मैं चुप रहा

असरार अकबराबादी

दो-जहाँ के हुस्न का अरमान आधा रह गया

असरार अकबराबादी

वस्ल की जो ख़्वाहिश है

असरा रिज़वी

सुना है चाँदनी-रातों में अक्सर तुम

असरा रिज़वी

परदेसी का ख़त

असरा रिज़वी

ख़्वाब इक जज़ीरा है

असरा रिज़वी

ख़िज़ाँ का मौसम

असरा रिज़वी

आओ चलें उस खंडर में

असरा रिज़वी

ज़िंदगी उलझी है बिखरे हुए गेसू की तरह

असरा रिज़वी

वो शख़्स फिर कहानी का उन्वान बन गया

असरा रिज़वी

उदास आँखें ग़ज़ाल आँखें

असरा रिज़वी

रात फिर ख़्वाब में आने का इरादा कर के

असरा रिज़वी

फिर कोई ताज़ा-सितम वो सितम-ईजाद करे

असरा रिज़वी

मैं तिरे शहर में फिरती रही मारी मारी

असरा रिज़वी

कर्गस को सुरख़ाब बनाना चाहोगे

असरा रिज़वी