Sad Poetry (page 217)

अक्स जल जाएँगे आईने बिखर जाएँगे

असलम महमूद

ऐ मिरे ग़ुबार-ए-सर तू ही तो नहीं तन्हा राएगाँ तो मैं भी हूँ

असलम महमूद

ज़लज़ले का ख़ौफ़ तारी है दर-ओ-दीवार पर

असलम कोलसरी

ज़ख़्म सहे मज़दूरी की

असलम कोलसरी

वही ख़्वाबीदा ख़ामोशी वही तारीक तन्हाई

असलम कोलसरी

रूठ कर निकला तो वो उस सम्त आया भी नहीं

असलम कोलसरी

रूठ कर निकला तो वो इस सम्त आया भी नहीं

असलम कोलसरी

क़रीब आ के भी इक शख़्स हो सका न मिरा

असलम कोलसरी

नज़र को वक़्फ़-ए-हैरत कर दिया है

असलम कोलसरी

जब मैं उस के गाँव से बाहर निकला था

असलम कोलसरी

हर-चंद बे-नवा है कोरे घड़े का पानी

असलम कोलसरी

ग़म की सौग़ात है ख़मोशी है

असलम कोलसरी

दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं

असलम कोलसरी

दयार-ए-हिज्र में ख़ुद को तो अक्सर भूल जाता हूँ

असलम कोलसरी

सामने शाह-ए-वक़्त के 'असलम' कौन कहे ये बात

असलम हनीफ़

रफ़ीक़ दोस्त मुहिब मुझ को शाक़ सब ही थे

असलम हनीफ़

सुबुक सा दर्द था उठता रहा जो ज़ख़्मों से

असलम हबीब

किसी की याद का साया था या कि झोंका था

असलम हबीब

धनक की बूँद

असलम फ़र्रुख़ी

ये हिकायत तमाम को पहुँची

असलम फ़र्रुख़ी

मैं सोचता हूँ कहीं तू ख़फ़ा न हो जाए

असलम फ़र्रुख़ी

हंगामा-ए-हस्ती से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

असलम फ़र्रुख़ी

बचपन के हैं ख़्वाब सुहाने तितली फूल और मैं

असलम फ़ैज़ी

उन्हें ये फ़िक्र कि दिल को कहाँ छुपा रक्खें

असलम इमादी

तुम्हारे दर्द से जागे तो उन की क़द्र खुली

असलम इमादी

शाम का रक़्स

असलम इमादी

मौत का इंतिज़ार सफ़ेद चाक से

असलम इमादी

ख़ौफ़

असलम इमादी

अब रात आ रही है

असलम इमादी

वो शब-ए-ग़म जो कम अँधेरी थी

असलम इमादी