Sad Poetry (page 219)
वो रंग उड़े हैं कुछ अब के बरस बहारों के
असलम अंसारी
वो नख़्ल जो बार-वर हुए हैं
असलम अंसारी
मुझे तो ये भी फ़रेब-ए-हवास लगता है
असलम अंसारी
लरज़ लरज़ के दिल-ए-ना-तवाँ ठहर ही न जाए
असलम अंसारी
कुछ तो ग़म-ख़ाना-ए-हस्ती में उजाला होता
असलम अंसारी
ख़फ़ा न हो कि तिरा हुस्न ही कुछ ऐसा था
असलम अंसारी
जब हमें इज़्न तमाशा होगा
असलम अंसारी
हर शख़्स इस हुजूम में तन्हा दिखाई दे
असलम अंसारी
गुबार-ए-एहसास-ए-पेश-ओ-पस की अगर ये बारीक तह हटाएँ
असलम अंसारी
एक समुंदर एक किनारा एक सितारा काफ़ी है
असलम अंसारी
दर्स-ए-आदाब-ए-जुनूँ याद दिलाने वाले
असलम अंसारी
बुझी है आतिश-ए-रंग-ए-बहार आहिस्ता आहिस्ता
असलम अंसारी
अपनी सदा की गूँज ही तुझ को डरा न दे
असलम अंसारी
ऐन-मुमकिन है किसी तर्ज़-ए-अदा में आए
असलम अंसारी
मिरे वजूद के अंदर है इक क़दीम मकान
आसिमा ताहिर
ख़्वाब का इंतिज़ार ख़त्म हुआ
आसिमा ताहिर
बाम-ओ-दर पर उतरने वाली धूप
आसिमा ताहिर
नज़्म
आसिमा ताहिर
नज़्म
आसिमा ताहिर
ज़ख़्म खा के भी मुस्कुराते हैं
आसिमा ताहिर
तेरी यादें बहाल रखती है
आसिमा ताहिर
सुनहरी धूप से चेहरा निखार लेती हूँ
आसिमा ताहिर
सदियों को बेहाल किया था
आसिमा ताहिर
पौ फटते ही ट्रेन की सीटी जब कानों में गूँजती है
आसिमा ताहिर
ख़ुद मैं धूनी रमाए बैठी हूँ
आसिमा ताहिर
अपनी आँखें जो बंद कर देखूँ
आसिमा ताहिर
तेज़ इतना ही अगर चलना है तन्हा जाओ तुम
आसिम वास्ती
सीखा न दुआओं में क़नाअत का सलीक़ा
आसिम वास्ती
मैं इंहिमाक में ये किस मक़ाम तक पहुँचा
आसिम वास्ती
बना रखा है मंसूबा कई बरसों का तू ने
आसिम वास्ती