Sad Poetry (page 270)
इक ज़रा सी चाह में जिस रोज़ बिक जाता हूँ मैं
आलोक यादव
भरे जो ज़ख़्म तो दाग़ों से क्यूँ उलझें?
आलोक यादव
मैं भी बिखरा हुआ हूँ अपनों में
आलोक मिश्रा
जाने किस बात से दुखा है बहुत
आलोक मिश्रा
ज़रा भी काम न आएगा मुस्कुराना क्या
आलोक मिश्रा
वो बे-असर था मुसलसल दलील करते हुए
आलोक मिश्रा
उन की आमद है गुल-फ़िशानी है
आलोक मिश्रा
सवालों में ख़ुद भी है डूबी उदासी
आलोक मिश्रा
साँस लेते हुए डर लगता है
आलोक मिश्रा
साल ये कौन सा नया है मुझे
आलोक मिश्रा
फूल से ज़ख़्मों का अम्बार सँभाले हुए हैं
आलोक मिश्रा
फिर तिरी यादों की फुंकारों के बीच
आलोक मिश्रा
मेरे ही आस-पास हो तुम भी
आलोक मिश्रा
ख़ाक हो कर भी कब मिटूंगा मैं
आलोक मिश्रा
जज़्ब कुछ तितलियों के पर में है
आलोक मिश्रा
जाने किस बात से दुखा है बहुत
आलोक मिश्रा
हम मुसलसल इक बयाँ देते हुए
आलोक मिश्रा
इक अधूरी सी कहानी मैं सुनाता कैसे
आलोक मिश्रा
दिल पर किसी की बात का ऐसा असर न था
आलोक मिश्रा
धूप अब सर पे आ गई होगी
आलोक मिश्रा
चीख़ की ओर मैं खिंचा जाऊँ
आलोक मिश्रा
बुझती आँखों में तिरे ख़्वाब का बोसा रक्खा
आलोक मिश्रा
बुझे लबों पे तबस्सुम के गुल सजाता हुआ
आलोक मिश्रा
आँखों का पूरा शहर ही सैलाब कर गया
आलोक मिश्रा
ये कौन तुम से अब कहे
अलमास शबी
वर्किंग लेडी
अलमास शबी
एहसास
अलमास शबी
तुझ को आना पड़ा यहीं तो फिर
अलमास शबी
तेरे पहलू में जी रही थी कभी
अलमास शबी
सवाल कैसे करूँ मैं इस से जवाब है जो मिरी दुआ का
अलमास शबी