Sad Poetry (page 268)

मजबूरियों में बाँट ले जो दर्द कौन है

अमर सिंह फ़िगार

किसे ख़याल कि इशरत के बाब कितने हैं

अमर सिंह फ़िगार

कौन कहता है कि तुम सोचो नहीं

अमर सिंह फ़िगार

जोश-ए-तकमील-ए-तमन्ना है ख़ुदा ख़ैर करे

अमर सिंह फ़िगार

जब कोई रास्ता नहीं होता

अमर सिंह फ़िगार

बैठा है सोगवार सितमगर के शहर में

अमर सिंह फ़िगार

किस तरह 'अमानत' न रहूँ ग़म से मैं दिल-गीर

अमानत लखनवी

जी चाहता है साने-ए-क़ुदरत पे हूँ निसार

अमानत लखनवी

ज़मज़मा किस की ज़बाँ पर ब-दिल-ए-शाद आया

अमानत लखनवी

उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज

अमानत लखनवी

सुब्ह-ए-विसाल-ए-ज़ीस्त का नक़्शा बदल गया

अमानत लखनवी

रूह को राह-ए-अदम में मिरा तन याद आया

अमानत लखनवी

रवाँ दवाँ नहीं याँ अश्क चश्म-ए-तर की तरह

अमानत लखनवी

लुत्फ़ अब ज़ीस्त का ऐ गर्दिश-ए-अय्याम नहीं

अमानत लखनवी

ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ सदा

अमानत लखनवी

हैं जल्वा-ए-तन से दर-ओ-दीवार बसंती

अमानत लखनवी

गिर पड़े दाँत हुए मू-ए-सर ऐ यार सफ़ेद

अमानत लखनवी

दिखलाए ख़ुदा उस सितम-ईजाद की सूरत

अमानत लखनवी

भूला हूँ मैं आलम को सरशार इसे कहते हैं

अमानत लखनवी

बस इतना याद है तुझ से मिला था रस्ते में

अल्ताफ़ परवाज़

समुंदरों को उठाए फिरी घटा बरसों

अल्ताफ़ परवाज़

सबा की बात सुनें फूल से कलाम करें

अल्ताफ़ परवाज़

वतन आज़ाद करने के लिए

अल्ताफ़ मशहदी

क़ौमी तराना

अल्ताफ़ मशहदी

रोना है ये कि आप भी हँसते थे वर्ना याँ

अल्ताफ़ हुसैन हाली

कुछ हँसी खेल सँभलना ग़म-ए-हिज्राँ में नहीं

अल्ताफ़ हुसैन हाली

हम रोज़-ए-विदाअ' उन से हँस हँस के हुए रुख़्सत

अल्ताफ़ हुसैन हाली

इक दर्द हो बस आठ पहर दिल में कि जिस को

अल्ताफ़ हुसैन हाली

नशात-ए-उमीद

अल्ताफ़ हुसैन हाली

मुनाजात-ए-बेवा

अल्ताफ़ हुसैन हाली