Sad Poetry (page 283)
उठते हुए तूफ़ान का मंज़र नहीं देखा
आलमताब तिश्ना
सिवाए-दर-ब-दरी उस को ख़ाक मिलता है
आलमताब तिश्ना
शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा हूँ
आलमताब तिश्ना
सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना
आलमताब तिश्ना
मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे
आलमताब तिश्ना
मैं अपनी जंग में तन-ए-तन्हा शरीक था
आलमताब तिश्ना
दर्द की इक लहर बल खाती है यूँ दिल के क़रीब
आलमताब तिश्ना
असीर-ए-दश्त-ए-बला का न माजरा कहना
आलमताब तिश्ना
आइना-ख़ाना भी अंदोह-ए-तमन्ना निकला
आलमताब तिश्ना
वो उन का व'अदा वो ईफ़ा-ए-अहद का आलम
आलम मुज़फ्फ़र नगरी
मिलेगा ज़ुल्फ़-ए-आज़ादी उन्हें क्या मौसम-ए-गुल में
आलम मुज़फ्फ़र नगरी
पीछे छूटे साथी मुझ को याद आ जाते हैं
आलम ख़ुर्शीद
किसी के रस्ते पे कैसे नज़रें जमाए रक्खूँ
आलम ख़ुर्शीद
इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े
आलम ख़ुर्शीद
याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बा'द
आलम ख़ुर्शीद
थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं
आलम ख़ुर्शीद
तह-ब-तह है राज़ कोई आब की तहवील में
आलम ख़ुर्शीद
सियाह रात के बदन पे दाग़ बन के रह गए
आलम ख़ुर्शीद
मैं जिधर जाऊँ मिरा ख़्वाब नज़र आता है
आलम ख़ुर्शीद
कभी कभी कितना नुक़सान उठाना पड़ता है
आलम ख़ुर्शीद
जमा हुआ है फ़लक पे कितना ग़ुबार मेरा
आलम ख़ुर्शीद
जब तक खुली नहीं थी असरार लग रही थी
आलम ख़ुर्शीद
जाना तो बहुत दूर है महताब से आगे
आलम ख़ुर्शीद
हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं
आलम ख़ुर्शीद
हर घर में कोई तह-ख़ाना होता है
आलम ख़ुर्शीद
हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता
आलम ख़ुर्शीद
कुछ तो इनायतें हैं मिरे कारसाज़ की
अकरम नक़्क़ाश
टूटी हुई शबीह की तस्ख़ीर क्या करें
अकरम नक़्क़ाश
क़रार-ए-गुम-शुदा मेरे ख़ुदा कब आएगा
अकरम नक़्क़ाश
मैं नहीं हूँ नहीं कहीं भी नहीं
अकरम नक़्क़ाश