Sad Poetry (page 282)
भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया
अलीम मसरूर
रूह अफ़्सुर्दा तबीअत मिरी ग़म-कोश हुई
अलीम मसरूर
घबराएँ हवादिस से क्या हम जीने के सहारे निकलेंगे
अलीम मसरूर
इक राज़-ए-ग़म-ए-दिल जब ख़ुद रह न सका दिल तक
अलीम मसरूर
इक मुंतज़िर-ए-वादा की शम्अ जली होगी
अलीम मसरूर
इक जुनूँ कहिए उसे जो मिरे सर से निकला
अलीम मसरूर
चले बज़्म-ए-दौराँ से जब ज़हर पी के
अलीम मसरूर
वक़्त
अलीम दुर्रानी
वो तअल्लुक़ है तिरे ग़म से कि अल्लाह अल्लाह
अलीम अख़्तर
मेरी बेताबियों से घबरा कर
अलीम अख़्तर
मेरे सुकून-ए-क़ल्ब को ले कर चले गए
अलीम अख़्तर
मआल-ए-ज़ब्त-ए-पैहम हो गई है
अलीम अख़्तर
हमें दुनिया में अपने ग़म से मतलब
अलीम अख़्तर
दर्द का फिर मज़ा है जब 'अख़्तर'
अलीम अख़्तर
दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए
अलीम अख़्तर
वो क्या गए पयाम-ए-सफ़र दे गए मुझे
अलीम अख़्तर
तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए
अलीम अख़्तर
शरीक-ए-हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार आज भी है
अलीम अख़्तर
निगाह-ए-लुत्फ़ क्या कम हो गई है
अलीम अख़्तर
मोहब्बत क्या मोहब्बत का सिला क्या
अलीम अख़्तर
मोहब्बत का रग-ओ-पै में मिरी रूह-ए-रवाँ होना
अलीम अख़्तर
किसी के वादा-ए-फ़र्दा पर ए'तिबार तो है
अलीम अख़्तर
दिल को शाइस्ता-ए-एहसास-ए-तमन्ना न करें
अलीम अख़्तर
दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए
अलीम अख़्तर
करना पड़ा था जिस के लिए ये सफ़र मुझे
अलीम अफ़सर
चले थे भर के रेत जब सफ़र की जिस्म-ओ-जाँ में हम
अलीम अफ़सर
बन के साहिल की निगाहों में तमाशा हम लोग
अलीम अफ़सर
बन कर लहू यक़ीन न आए तो देख लें
अलीम अफ़सर
ये कहना तुम से बिछड़ कर बिखर गया 'तिश्ना'
आलमताब तिश्ना
मैं जब भी घर से निकलता हूँ रात को तन्हा
आलमताब तिश्ना