Sad Poetry (page 280)

सफ़ीर-ए-लैला-4

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-3

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-2

अली अकबर नातिक़

रह-ज़नी ख़ूब नहीं ख़्वाजा-सराओं के लिए

अली अकबर नातिक़

प्यासा ऊँट

अली अकबर नातिक़

नौहा

अली अकबर नातिक़

नाम ओ नसब

अली अकबर नातिक़

मुसीबत की ख़बरें

अली अकबर नातिक़

मिरे चराग़ बुझ गए

अली अकबर नातिक़

लुहार जानता नहीं

अली अकबर नातिक़

हुजूम-ए-गिर्या

अली अकबर नातिक़

बे-यक़ीन बस्तियाँ

अली अकबर नातिक़

रो चले चश्म से गिर्या की रियाज़त कर के

अली अकबर नातिक़

क़ैद-ख़ाने की हवा में शोर है आलाम का

अली अकबर नातिक़

कँवल हों आब में ख़ुश गुल सबा में शाद रहें

अली अकबर नातिक़

हरीम-ए-दिल, कि सर-ब-सर जो रौशनी से भर गया

अली अकबर नातिक़

बाद-ए-सहरा को रह-ए-शहर पे डाला किस ने

अली अकबर नातिक़

आँखें थीं वीरान नज़र कैसे आता

अली अकबर मंसूर

हिज्र बना आज़ार सफ़र कैसे कटता

अली अकबर मंसूर

ऐ शाएर! तेरा दर्द बड़ा ऐ शाएर! तेरी सोच बड़ी

अली अकबर अब्बास

तलाश-ए-आख़र

अली अकबर अब्बास

मैं अपने वक़्त में अपनी रिदा में रहता हूँ

अली अकबर अब्बास

किसी पे बार-ए-दिगर भी निगाह कर न सके

अली अकबर अब्बास

कभी सर पे चढ़े कभी सर से गुज़रे कभी पाँव आन गिरे दरिया

अली अकबर अब्बास

जो ख़ुद को पाएँ तो फिर दूसरा तलाश करें

अली अकबर अब्बास

देखने में लगती थी भीगती सिमटती रात

अली अकबर अब्बास

नशेमन ही के लुट जाने का ग़म होता तो क्या ग़म था

अली अहमद जलीली

काटी है ग़म की रात बड़े एहतिराम से

अली अहमद जलीली

ग़म से मंसूब करूँ दर्द का रिश्ता दे दूँ

अली अहमद जलीली

मुस्तहिक़ वो लज़्ज़त-ए-ग़म का नहीं

अली अहमद जलीली