Sad Poetry (page 74)
इश्क़ में मारका-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र क्या कहिए
हफ़ीज़ बनारसी
हिसार-ए-ज़ात के दीवार-ओ-दर में क़ैद रहे
हफ़ीज़ बनारसी
इक हुस्न-ए-तसव्वुर है जो ज़ीस्त का साथी है
हफ़ीज़ बनारसी
दुश्मनों की जफ़ा का ख़ौफ़ नहीं
हफ़ीज़ बनारसी
पैग़ाम ईद
हफ़ीज़ बनारसी
ये कैसी हवा-ए-ग़म-ओ-आज़ार चली है
हफ़ीज़ बनारसी
ये हादसा भी शहर-ए-निगाराँ में हो गया
हफ़ीज़ बनारसी
ये और बात कि लहजा उदास रखते हैं
हफ़ीज़ बनारसी
वो तो बैठे रहे सर झुकाए हुए
हफ़ीज़ बनारसी
तेज़ जब ख़ंजर-ए-बेदाद किया जाएगा
हफ़ीज़ बनारसी
क़दम शबाब में अक्सर बहकने लगता है
हफ़ीज़ बनारसी
लहू की मय बनाई दिल का पैमाना बना डाला
हफ़ीज़ बनारसी
लब-ए-फ़ुरात वही तिश्नगी का मंज़र है
हफ़ीज़ बनारसी
क्या जुर्म हमारा है बता क्यूँ नहीं देते
हफ़ीज़ बनारसी
कुछ सोच के परवाना महफ़िल में जला होगा
हफ़ीज़ बनारसी
कोई बतलाए कि ये तुर्फ़ा तमाशा क्यूँ है
हफ़ीज़ बनारसी
ख़फ़ा है गर ये ख़ुदाई तो फ़िक्र ही क्या है
हफ़ीज़ बनारसी
जो पर्दों में ख़ुद को छुपाए हुए हैं
हफ़ीज़ बनारसी
जो पर्दों में ख़ुद को छुपाए हुए हैं
हफ़ीज़ बनारसी
जो नज़र से बयान होती है
हफ़ीज़ बनारसी
जो ख़त है शिकस्ता है जो अक्स है टूटा है
हफ़ीज़ बनारसी
जब तसव्वुर में कोई माह-जबीं होता है
हफ़ीज़ बनारसी
जब भी तिरी यादों की चलने लगी पुर्वाई
हफ़ीज़ बनारसी
इश्क़ में हर नफ़स इबादत है
हफ़ीज़ बनारसी
हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है
हफ़ीज़ बनारसी
गुमराह कह के पहले जो मुझ से ख़फ़ा हुए
हफ़ीज़ बनारसी
इक शगुफ़्ता गुलाब जैसा था
हफ़ीज़ बनारसी
दिल की आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिए
हफ़ीज़ बनारसी
दिल की आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिए
हफ़ीज़ बनारसी
आ जाओ कि मिल कर हम जीने की बिना डालें
हफ़ीज़ बनारसी