प्रेम Poetry (page 17)

फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरह

सुदर्शन फ़ाकिर

सिलसिला ख़त्म कर चले आए

सुभाष पाठक ज़िया

मुझे तो मोहब्बत से इंकार होगा

सुभाष पाठक ज़िया

अब ख़िज़ाँ आए या बहार आए

सोज़ नजीबाबादी

वफ़ाओं के इरादे वुसअ'त-ए-मंज़िल में रहते हैं

सोज़ बरेलवी

निगाह मुझ से मिलाने की उन में ताब नहीं

सिया सचदेव

मैं ने कहा कि तजज़िया-ए-जिस्म-ओ-जाँ करो

सिराजुद्दीन ज़फ़र

इस्लाह-ए-अहल-ए-होश का यारा नहीं हमें

सिराजुद्दीन ज़फ़र

दर-ए-मय-ख़ाना से दीवार-ए-चमन तक पहुँचे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

सज्दा-ए-इश्क़ पे तन्क़ीद न कर ऐ वाइ'ज़

सिराज लखनवी

नमाज़-ए-इश्क़ पढ़ी तो मगर ये होश किसे

सिराज लखनवी

जान सी शय की मुझे इश्क़ में कुछ क़द्र नहीं

सिराज लखनवी

आग और धुआँ और हवस और है इश्क़ और

सिराज लखनवी

क़िस्मत से लड़ती हैं निगाहें

सिराज लखनवी

न कुरेदूँ इश्क़ के राज़ को मुझे एहतियात-ए-कलाम है

सिराज लखनवी

मुझे अब हवा-ए-चमन नहीं कि क़फ़स में गूना क़रार है

सिराज लखनवी

लिया जन्नत में भी दोज़ख़ का सहारा हम ने

सिराज लखनवी

ख़याल-ए-दोस्त न मैं याद-ए-यार में गुम हूँ

सिराज लखनवी

ईमाँ की नुमाइश है सज्दे हैं कि अफ़्साने

सिराज लखनवी

फ़ितरत-ए-इश्क़ गुनहगार हुई जाती है

सिराज लखनवी

दुनिया का न उक़्बा का कोई ग़म नहीं सहते

सिराज लखनवी

वो अजब घड़ी थी मैं जिस घड़ी लिया दर्स नुस्ख़ा-ए-इश्क़ का

सिराज औरंगाबादी

वो आशिक़ी के खेत में साबित क़दम हुआ

सिराज औरंगाबादी

तिरी अबरू है मेहराब-ए-मोहब्बत

सिराज औरंगाबादी

मिरे सीं दूर क्या चाहते हैं साया-ए-इश्क़

सिराज औरंगाबादी

मकतब-ए-इश्क़ का मोअल्लिम हूँ

सिराज औरंगाबादी

कुफ़्र-ओ-ईमाँ दो नदी हैं इश्क़ कीं

सिराज औरंगाबादी

किया ख़ाक आतिश-ए-इश्क़ ने दिल-ए-बे-नवा-ए-'सिराज' कूँ

सिराज औरंगाबादी

ख़बर-ए-तहय्युर-ए-इश्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रही

सिराज औरंगाबादी

जब सीं लाया इश्क़ ने फ़ौज-ए-जुनूँ

सिराज औरंगाबादी

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