Ghazal Poetry (page 869)
मैं तिरी मानता लेकिन जो मिरा दिल है ना
अहमद अता
मैं न होने से हुआ या'नी बड़ी तक़्सीर की
अहमद अता
कोई गुमाँ हूँ कोई यक़ीं हूँ कि मैं नहीं हूँ
अहमद अता
ख़्वाब का इज़्न था ता'बीर-ए-इजाज़त थी मुझे
अहमद अता
कल ख़्वाब में इक परी मिली थी
अहमद अता
इश्क़ से भाग के जाया भी नहीं जा सकता
अहमद अता
हुई ग़ज़ल ही न कुछ बात बन सकी हम से
अहमद अता
हमें न देखिए हम ग़म के मारे जैसे हैं
अहमद अता
हमारी आँखें भी साहिब अजीब कितनी हैं
अहमद अता
हमारा इश्क़ सलामत है यानी हम अभी हैं
अहमद अता
इक रात मैं सो नहीं सका था
अहमद अता
इक अश्क बहा होगा
अहमद अता
दोनों के जो दरमियाँ ख़ला है
अहमद अता
दिल कोई फूल नहीं और सितारा भी नहीं
अहमद अता
बेबसी ऐसी भी होती है भला
अहमद अता
ऐ मियाँ कौन ये कहता है मोहब्बत की है
अहमद अता
ज़मीं वालों की बस्ती में सुकूनत चाहती है
अहमद अशफ़ाक़
वो मिरी जुराअत-ए-कमयाब से ना-वाक़िफ़ हैं
अहमद अशफ़ाक़
तुम जो आ जाओ ग़म धुआँ हो जाए
अहमद अशफ़ाक़
सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से
अहमद अशफ़ाक़
जितनी हम चाहते थे उतनी मोहब्बत नहीं दी
अहमद अशफ़ाक़
हम तिरे इश्क़ में कुछ ऐसे ठिकाने लग जाएँ
अहमद अशफ़ाक़
गए दिनों की रक़ाबत को वो भुला न सके
अहमद अशफ़ाक़
दे के वो सारे इख़्तियार मुझे
अहमद अशफ़ाक़
अना मुँह आँसुओं से धो रही है
अहमद अशफ़ाक़
अब किसी ख़्वाब की ताबीर नहीं चाहता मैं
अहमद अशफ़ाक़
वफ़ा कम है नज़र आती बहुत है
अहमद अल्वी
वो हस्ब-ए-वादा न आया तो आँख भर आई
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
उस ने किया है वादा-ए-फ़र्दा आने दो उस को आए तो
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
तख़्ता-ए-मश्क़-ए-सितम मुझ को बनाने वाला
अहमद अली बर्क़ी आज़मी