ख्वाब Poetry (page 102)
दिल मुनाफ़िक़ था शब-ए-हिज्र में सोया कैसा
अहमद फ़राज़
दिल बदन का शरीक-ए-हाल कहाँ
अहमद फ़राज़
ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते
अहमद फ़राज़
अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है
अहमद फ़राज़
अब क्या सोचें क्या हालात थे किस कारन ये ज़हर पिया है
अहमद फ़राज़
अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
अहमद फ़राज़
आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो
अहमद फ़राज़
वक़्त के हर इक नक़्श का मअ'नी इतना बदला बदला होगा
अहमद फ़क़ीह
सदियों के अँधेरे में उतारा करे कोई
अहमद फ़क़ीह
धुँद में खो के रह गईं सूरतें मेहर-ओ-माह सी
अहमद अज़ीम
मैं तो सोया भी न था क्यूँ ये दर-ए-ख़्वाब गिरा
अहमद अज़ीम
इश्क़ में हो के मुब्तिला दिल ने कमाल कर दिया
अहमद अज़ीम
ऐसी भी कहाँ बे-सर-ओ-सामानी हुई है
अहमद अज़ीम
ऐसा इलाज-ए-हब्स-ए-दिल-ए-ज़ार चाहिए
अहमद अज़ीम
नज़्म
अहमद आज़ाद
ख़िज़ाँ के आते आते
अहमद आज़ाद
जो मेरे मरने का तमाशा नहीं देखना चाहती
अहमद आज़ाद
ज़िंदगी ख़्वाब है और ख़्वाब भी ऐसा कि मियाँ
अहमद अता
ये जो रातों को मुझे ख़्वाब नहीं आते 'अता'
अहमद अता
ताबीर बताई जा चुकी है
अहमद अता
किसी को ख़्वाब में अक्सर पुकारते हैं हम
अहमद अता
ये मिरा वहम तो कुछ और सुना जाता है
अहमद अता
ये अक्स आप ही बनते हैं हम से मिलते हैं
अहमद अता
सफ़्हा-ए-ज़ीस्त जब पढूँगा तुम्हें
अहमद अता
मिरे लिए तिरा होना अहम ज़ियादा है
अहमद अता
ख़्वाब का इज़्न था ता'बीर-ए-इजाज़त थी मुझे
अहमद अता
कल ख़्वाब में इक परी मिली थी
अहमद अता
इश्क़ से भाग के जाया भी नहीं जा सकता
अहमद अता
हुई ग़ज़ल ही न कुछ बात बन सकी हम से
अहमद अता
हमारी आँखें भी साहिब अजीब कितनी हैं
अहमद अता