ख्वाब Poetry (page 99)

किस रक़्स-ए-जान-आे-तन में मिरा दिल नहीं रहा

अहमद मुश्ताक़

किस झुटपुटे के रंग उजालों में आ गए

अहमद मुश्ताक़

ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं

अहमद मुश्ताक़

ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं

अहमद मुश्ताक़

खड़े हैं दिल में जो बर्ग-ओ-समर लगाए हुए

अहमद मुश्ताक़

हम गिरे हैं जो आ के इतनी दूर

अहमद मुश्ताक़

दुख की चीख़ें प्यार की सरगोशियाँ रह जाएँगी

अहमद मुश्ताक़

छिन गई तेरी तमन्ना भी तमन्नाई से

अहमद मुश्ताक़

चश्म ओ लब कैसे हों रुख़्सार हों कैसे तेरे

अहमद मुश्ताक़

भूले-बिसरे मौसमों के दरमियाँ रहता हूँ मैं

अहमद मुश्ताक़

अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा

अहमद मुश्ताक़

उसे भुलाया तो अपना ख़याल भी न रहा

अहमद महफ़ूज़

मिलने दिया न उस से हमें जिस ख़याल ने

अहमद महफ़ूज़

ज़ख़्म खाना ही जब मुक़द्दर हो

अहमद महफ़ूज़

वो इक सवाल-ए-सितारा कि आसमान में था

अहमद महफ़ूज़

उस से रिश्ता है अभी तक मेरा

अहमद महफ़ूज़

उधर से आए तो फिर लौट कर नहीं गए हम

अहमद महफ़ूज़

रक़्स-ए-शरर क्या अब के वहशत-नाक हुआ

अहमद महफ़ूज़

नहीं आसमाँ तिरी चाल में नहीं आऊँगा

अहमद महफ़ूज़

किसी का अक्स-ए-बदन था न वो शरारा था

अहमद महफ़ूज़

छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ

अहमद महफ़ूज़

बदन-सराब न दरिया-ए-जाँ से मिलता है

अहमद महफ़ूज़

आया ही नहीं कोई बोझ अपना उठाने को

अहमद महफ़ूज़

दश्त में वादी-ए-शादाब को छू कर आया

अहमद ख़याल

कोई अन-देखी फ़ज़ा तस्वीर करना चाहिए

अहमद ख़याल

दश्त में वादी-ए-शादाब को छू कर आया

अहमद ख़याल

दरिया में दश्त दश्त में दरिया सराब है

अहमद ख़याल

तेरे हिस्से के भी सदमात उठा लेता हूँ

अहमद कामरान

ख़्वाब यूँ ही नहीं होते पूरे

अहमद कामरान

ये गर्म रेत ये सहरा निभा के चलना है

अहमद कमाल परवाज़ी