Friendship Poetry (page 70)

तज्दीद-ए-रस्म-ओ-राह-ए-मुलाक़ात कीजिए

अनवर साबरी

रहते हुए क़रीब जुदा हो गए हो तुम

अनवर साबरी

दौर-ए-हाज़िर हो गया है इस क़दर कम-आश्ना

अनवर साबरी

अता-ए-ग़म पे भी ख़ुश हूँ मिरी ख़ुशी क्या है

अनवर साबरी

प्यार को पा कर जो महरूमी हुई

अनवर नदीम

वादा-ए-शाम-ए-फ़र्दा पे ऐ दिल मुझे गर यक़ीं ही न आए तो मैं क्या करूँ

अनवर मिर्ज़ापुरी

ख़्वाब बिखरेंगे तो हम को भी बिखरना होगा

अनवर मीनाई

हर दम दुआ-ए-आब-ओ-हवा माँगते रहे

अनवर मीनाई

उर्दू से हो क्यूँ बेज़ार इंग्लिश से क्यूँ इतना प्यार

अनवर मसूद

रात का क्या ज़िक्र है शाम-ओ-सहर आया नहीं

अनवर जमाल अनवर

पराया कौन है और कौन अपना सब भुला देंगे

अनवर जलालपुरी

उस की सूरत उस की आँखें उस का चेहरा भूल गए

अनवार हबीब

मैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा हूँ छुट के जाऊँगा कहाँ

अनवर देहलवी

यूसुफ़-ए-हुस्न का हुस्न आप ख़रीदार रहा

अनवर देहलवी

उन से हम लौ लगाए बैठे हैं

अनवर देहलवी

नज़र आए क्या मुझ से फ़ानी की सूरत

अनवर देहलवी

न मैं समझा न आप आए कहीं से

अनवर देहलवी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

है भी और फिर नज़र नहीं आती

अनवर देहलवी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

नए दिनों के नए सहीफ़ों में ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा नहीं है

अनवर अलीमी

जब मिरी ज़ीस्त के उनवाँ नए मतलूब हुए

अनवर मोअज़्ज़म

ग़म सहें या ख़ुशी को प्यार करें

अंजुम सिद्दीक़ी

ये मोहब्बत का जो अम्बार पड़ा है मुझ में

अंजुम सलीमी

पत्थर में कौन जोंक लगाएगा मेरे दोस्त

अंजुम सलीमी

मैं दिल-ए-गिरफ़्ता तुझे गुनगुनाता रहता हूँ

अंजुम सलीमी