Friendship Poetry (page 71)

कहने सुनने के लिए और बचा ही क्या है

अंजुम सलीमी

विसाल की तीसरी सम्त

अंजुम सलीमी

तन्हाई का सफ़रनामा

अंजुम सलीमी

काश

अंजुम सलीमी

ये मोहब्बत का जो अम्बार पड़ा है मुझ में

अंजुम सलीमी

उम्र की सारी थकन लाद के घर जाता हूँ

अंजुम सलीमी

सहर को खोज चराग़ों पे इंहिसार न कर

अंजुम सलीमी

कैसी सोहबत है कैसी तन्हाई

अंजुम सलीमी

काग़ज़ था मैं दिए पे मुझे रख दिया गया

अंजुम सलीमी

इक दूजे को देर से समझा देर से यारी की

अंजुम सलीमी

यहाँ तो फिर वही दीवार-ओ-दर निकल आए

अंजुम रूमानी

नहीं नाम-ओ-निशाँ साए का लेकिन यार बैठे हैं

अंजुम रूमानी

जब भी कोई बात की आँसू ढलके साथ

अंजुम रूमानी

है वाक़िआ कुछ और रिवायत कुछ और है

अंजुम रूमानी

दुखी दिलों के लिए ताज़ियाना रखता है

अंजुम रूमानी

दिन हो कि रात, कुंज-ए-क़फ़स हो कि सेहन-ए-बाग़

अंजुम रूमानी

दिन हो कि रात कुंज-ए-क़फ़स हो कि सेहन-ए-बाग़

अंजुम रूमानी

रंग इस मौसम में भरना चाहिए

अंजुम रहबर

बे-हिफ़ाज़त ही मिरा गंज-ए-मआ'नी रह गया

अंजुम नियाज़ी

दिल भर आया फिर भी राज़-ए-दिल छुपाना ही पड़ा

अंजुम मानपुरी

दोस्ती बंदगी वफ़ा-ओ-ख़ुलूस

अंजुम लुधियानवी

ख़ुद से मिलना मिलाना भूल गए

अंजुम लुधियानवी

पलकों तक आ के अश्क का सैलाब रह गया

अंजुम ख़लीक़

कुछ उज़्र पस-ए-वा'दा-ख़िलाफ़ी नहीं रखते

अंजुम ख़लीक़

ख़ाक का रिज़्क़ यहाँ हर कस-ओ-ना-कस निकला

अंजुम ख़लीक़

कहाँ तक और इस दुनिया से डरते ही चले जाना

अंजुम ख़लीक़

चाहे तू शौक़ से मुझे वहशत-ए-दिल शिकार कर

अंजुम ख़लीक़

अब शहर में अक़दार-कुशी एक हुनर है

अंजुम ख़लीक़

तेशा-ब-कफ़ को आइना-गर कह दिया गया

अंजुम इरफ़ानी

इस ने देखा है सर-ए-बज़्म सितमगर की तरह

अंजुम इरफ़ानी