Friendship Poetry (page 69)
'अर्श' किस दोस्त को अपना समझूँ
अर्श मलसियानी
पहला सा वो जुनून-ए-मोहब्बत नहीं रहा
अर्श मलसियानी
मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है
अर्श मलसियानी
खिंच के महबूब के दामन की तरफ़
अर्श मलसियानी
इश्क़-ए-बुताँ का ले के सहारा कभी कभी
अर्श मलसियानी
ये शहर है वो शहर कि जिस में हैं बे-वज्ह कामयाब चेहरे
अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ
जब सितारों की रिदा काँधे से सरकाती है रात
अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ
ज़ख़्म सब उस को दिखा कर रक़्स कर
आरिफ़ इमाम
ज़हराब-ए-तिश्नगी का मज़ा हम से पूछिए
आरिफ़ अंसारी
दास्ताँ भी मुख़्तलिफ़ लहजा भी यारों से जुदा
आरिफ़ अंसारी
अपने अहबाब को अशआ'र सुनाने निकला
आरिफ़ अंसारी
ज़मीं से ता-ब-फ़लक कोई फ़ासला भी नहीं
आरिफ़ अब्दुल मतीन
सुकून-ए-दिल न मयस्सर हुआ ज़माने में
अनवापुल हसन अनवार
भूलने वाले तुझे याद किया है बरसों
अनवापुल हसन अनवार
सारे कुश्तों से जुदा ढंग इज़्तिराब-ए-दिल का है
अनवरी जहाँ बेगम हिजाब
मुहीत-ए-रहमत है जोश-अफ़ज़ा हुई है अब्र-ए-सख़ा की आमद
अनवरी जहाँ बेगम हिजाब
आना भी आने वाले का अफ़्साना हो गया
अनवरी जहाँ बेगम हिजाब
क्या शहर में है गर्मी-ए-बाज़ार के सिवा
अनवर सिद्दीक़ी
दोस्त कहता हूँ तुम्हें शाएर नहीं कहता 'शुऊर'
अनवर शऊर
न सह सकूँगा ग़म-ए-ज़ात गो अकेला मैं
अनवर शऊर
कड़ा है दिन बड़ी है रात जब से तुम नहीं आए
अनवर शऊर
इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह
अनवर शऊर
इस में क्या शक है कि आवारा हूँ मैं
अनवर शऊर
पागलों की मद्ह में
अनवर सेन रॉय
अपने लिए एक नौहा
अनवर सेन रॉय
क्यूँ ख़फ़ा हम से हो ख़ता क्या है
अनवर सहारनपुरी
जल्वे दिखाए यार ने अपनी हरीम-ए-नाज़ में
अनवर सहारनपुरी
एक ख़्वाहिश
अनवर सदीद
ज़ोर से आँधी चली तो बुझ गए सारे चराग़
अनवर सदीद
उम्र गुज़री है इल्तिजा करते
अनवर साबरी