Friendship Poetry (page 93)
ये इक और हम ने क़रीना किया
अबुल हसनात हक़्क़ी
फूल का या संग का इज़हार कर
अबुल हसनात हक़्क़ी
दिल को हम दरिया कहें मंज़र-निगारी और क्या
अबुल हसनात हक़्क़ी
ये बंदगी का सदा अब समाँ रहे न रहे
अबु मोहम्मद वासिल
तसव्वुरात में इन को बुला के देख लिया
अबु मोहम्मद वासिल
मसरूर हो रहे हैं ग़म-ए-आशिक़ी से हम
अबु मोहम्मद वासिल
अगर मेरी जबीन-ए-शौक़ वक़्फ़-ए-बंदगी होती
अबु मोहम्मद वासिल
आगे वो जा भी चुके लुत्फ़-ए-नज़ारा भी गया
अबु मोहम्मद वासिल
वक़्त ग़मनाक सवालों में न बर्बाद करें
अबु मोहम्मद सहर
जब ये दावे थे कि हर दुख का मुदावा हो गए
अबु मोहम्मद सहर
यारो हमारा हाल सजन सीं बयाँ करो
आबरू शाह मुबारक
तुम यूँ सियाह-चश्म ऐ सजन मुखड़े के झुमकों से हुए
आबरू शाह मुबारक
मिल गया था बाग़ में माशूक़ इक नक-दार सा
आबरू शाह मुबारक
क्यूँ न आ कर उस के सुनने को करें सब यार भीड़
आबरू शाह मुबारक
क्या सबब तेरे बदन के गर्म होने का सजन
आबरू शाह मुबारक
जब कि ऐसा हो गंदुमी माशूक़
आबरू शाह मुबारक
ग़म से हम सूख जब हुए लकड़ी
आबरू शाह मुबारक
आज यारों को मुबारक हो कि सुब्ह-ए-ईद है
आबरू शाह मुबारक
आग़ोश सीं सजन के हमन कूँ किया कनार
आबरू शाह मुबारक
ये तिरी दुश्नाम के पीछे हँसी गुलज़ार सी
आबरू शाह मुबारक
ये बाव क्या फिरी कि तिरी लट पलट गई
आबरू शाह मुबारक
यार रूठा है हम सें मनता नहिं
आबरू शाह मुबारक
या सजन तर्क-ए-मुलाक़ात करो
आबरू शाह मुबारक
तुम्हारी जब सीं आई हैं सजन दुखने को लाल अँखियाँ
आबरू शाह मुबारक
तीरा-रंगों के हुआ हक़ में ये तप करना दवा
आबरू शाह मुबारक
शौक़ बढ़ता है मिरे दिल का दिल-अफ़गारों के बीच
आबरू शाह मुबारक
शब-ए-सियाह हुआ रोज़ ऐ सजन तुझ बिन
आबरू शाह मुबारक
रता है अबरुवाँ पर हाथ अक्सर लावबाली का
आबरू शाह मुबारक
रखे कोई इस तरह के लालची को कब तलक बहला
आबरू शाह मुबारक
पलंग कूँ छोड़ ख़ाली गोद सीं जब उठ गया मीता
आबरू शाह मुबारक