Heart Broken Poetry (page 195)
एक ख़्वाहिश
बशर नवाज़
अज़ल-ता-अबद
बशर नवाज़
अबदियत
बशर नवाज़
ये हुस्न है झरनों में न है बाद-ए-चमन में
बशर नवाज़
सारे मंज़र फ़ुसूँ तमाशा हैं
बशर नवाज़
रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे
बशर नवाज़
रब्त हर बज़्म से टूटे तिरी महफ़िल के सिवा
बशर नवाज़
क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तय्यार हुए
बशर नवाज़
कोई सनम तो हो कोई अपना ख़ुदा तो हो
बशर नवाज़
जब कभी होंगे तो हम माइल-ए-ग़म ही होंगे
बशर नवाज़
जब छाई घटा लहराई धनक इक हुस्न-ए-मुकम्मल याद आया
बशर नवाज़
हर नई रुत में नया होता है मंज़र मेरा
बशर नवाज़
घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं
बशर नवाज़
दिल के हर दर्द ने अशआ'र में ढलना चाहा
बशर नवाज़
छेड़ा ज़रा सबा ने तो गुलनार हो गए
बशर नवाज़
बाज़ार-ए-ज़िंदगी में जमे कैसे अपना रंग
बशर नवाज़
बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया
बशर नवाज़
अक्स हर रोज़ किसी ग़म का पड़ा करता है
बशर नवाज़
आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी
बशर नवाज़
पूछा अगर किसी ने मिरा आ के हाल-ए-दिल
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
जोश-ए-वहशत यही कहता है निहायत कम है
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
इतना तो जज़्ब-ए-इश्क़ ने बारे असर किया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
देख कर तूल-ए-शब-ए-हिज्र दुआ करता हूँ
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
वहशत में भी रुख़ जानिब-ए-सहरा न करेंगे
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
रंग से पैरहन-ए-सादा हिनाई हो जाए
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
पर्दा उलट के उस ने जो चेहरा दिखा दिया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
न कोई उन के सिवा और जान-ए-जाँ देखा
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
मिसाल-ए-तार-ए-नज़र क्या नज़र नहीं आता
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
मतलब न काबे से न इरादा कनिश्त का
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
मैं अगर रोने लगूँ रुतबा-ए-वाला बढ़ जाए
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़