Heart Broken Poetry (page 194)
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
बशीर बद्र
आहन में ढलती जाएगी इक्कीसवीं सदी
बशीर बद्र
मुब्तला-ए-इ'ताब हैं हम लोग
बशीरुद्दीन राज़
जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया
बशीरुद्दीन राज़
हुई मुद्दतें ऐ दिल-ए-हज़ीं न पयाम है न सलाम है
बशीरुद्दीन राज़
दिल जो उम्मीद-वार होता है
बशीरुद्दीन राज़
ज़ख़्म खा के ख़ंदाँ हैं पैरहन-दरीदा हम
बशीर मुंज़िर
मिस्ल-ए-नमरूद हर इक शख़्स ख़ुदाई माँगे
बशीर मुंज़िर
हम बयाबानों में घूमे शहर की सड़कों पे टहले
बशीर मुंज़िर
हैराँ है ज़माने में किसे अपना कहे दिल
बशीर मुंज़िर
दम-ब-ख़ुद है चाँदनी चुप-चाप हैं अश्जार भी
बशीर मुंज़िर
अच्छे कभी बुरे हैं हालात आदमी के
बशीर मुंज़िर
या मह-ओ-साल की दीवार गिरा दी जाए
बशीर अहमद बशीर
क़र्या क़र्या ख़ाक उड़ाई कूचा-गर्द फ़क़ीर हुए
बशीर अहमद बशीर
कैसी कैसी थीं उन्ही गलियों में ज़ेबा सूरतें
बशीर अहमद बशीर
जुदा भी हो के वो इक पल कभी जुदा न हुआ
बशीर अहमद बशीर
जी नहीं लगता किताबों में किताबें क्या करें
बशीर अहमद बशीर
इन चटख़्ते पत्थरों पर पाँव धरना ध्यान से
बशीर अहमद बशीर
हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में
बशीर अहमद बशीर
गिरफ़्त-ए-ज़ीस्त में हूँ क़ैद-ए-बे-हिसार में हूँ
बशीर अहमद बशीर
इक बे-सबात अक्स बना बे-निशाँ गया
बशीर अहमद बशीर
दूर तक चारों तरफ़ मेरे सिवा कोई न था
बशीर अहमद बशीर
ऐसा तह-ए-अफ़्लाक ख़राबा नहीं कोई
बशीर अहमद बशीर
घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं
बशर नवाज़
बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया
बशर नवाज़
तो ऐसा क्यूँ नहीं करते
बशर नवाज़
पता नहीं वो कौन था
बशर नवाज़
मुझे जीना नहीं आता
बशर नवाज़
करोगे याद तो हर बात याद आएगी
बशर नवाज़
फ़ासला
बशर नवाज़