Heart Broken Poetry (page 222)
सब बातें ला-हासिल ठहरीं सारे ज़िक्र फ़ुज़ूल गए
अज़हर अली
तुम उस की बातों में न आना
अज़हर अदीब
दश्त-ए-शब में पता ही नहीं चल सका
अज़हर अदीब
ऐ शहर-ए-सितम छोड़ के जाते हुए लोगो
अज़हर अदीब
आज निकले याद की ज़म्बील से
अज़हर अदीब
वो शब के साए में फ़स्ल-ए-नशात काटते हैं
अज़हर अदीब
सुब्ह कैसी है वहाँ शाम की रंगत क्या है
अज़हर अदीब
रौशनी हस्ब-ए-ज़रूरत भी नहीं माँगते हम
अज़हर अदीब
क़ज़ा का तीर था कोई कमान से निकल गया
अज़हर अदीब
लहजे और आवाज़ में रक्खा जाता है
अज़हर अदीब
कुछ अब के रस्म-ए-जहाँ के ख़िलाफ़ करना है
अज़हर अदीब
कल परदेस में याद आएगी ध्यान में रख
अज़हर अदीब
जगह फूलों की रखते हैं घना साया बनाते हैं
अज़हर अदीब
घनेरी छाँव के सपने बहुत दिखाए गए
अज़हर अदीब
दिल प्यासा और आँख सवाली रह जाती है
अज़हर अदीब
दर-ओ-दीवार से डर लग रहा था
अज़हर अदीब
दरीचों में चराग़ों की कमी महसूस होती है
अज़हर अदीब
हाथ पत्थर से हो गए मानूस
अज़हर अब्बास
ये रात आख़िरी लोरी सुनाने वाली है
अज़हर अब्बास
पंछियों की किसी क़तार के साथ
अज़हर अब्बास
मिरी कहानी तिरी कहानी से मुख़्तलिफ़ है
अज़हर अब्बास
जब तिरे ख़्वाब से बेदार हुआ करते थे
अज़हर अब्बास
इधर महसूस होती है कमी उस की
अज़हर अब्बास
हवा-ए-तेज़ के आगे कहाँ रहेगा कोई
अज़हर अब्बास
अपने वीराने का नुक़सान नहीं चाहता मैं
अज़हर अब्बास
अजीब लगता है यूँही बिछा हुआ बिस्तर
अज़हर अब्बास
ऐसे पामाल कि पहचान में आते ही नहीं
अज़हर अब्बास
सुब्ह आती है तो अख़बार से लग जाते हैं
अज़ीज़ परीहारी
मैं सोचता हूँ सबक़ मैं ने वो पढ़ा ही नहीं
अज़ीज़ परीहारी
ख़ुद से अब मुझ को जुदा यूँ ही मिरी जाँ रखना
अज़ीज़ परीहारी