Heart Broken Poetry (page 224)
रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया
आज़ाद गुलाटी
फेंका था हम पे जो कभी उस को उठा के देख
आज़ाद गुलाटी
दश्त-ए-ज़ुल्मात में हम-राह मिरे
आज़ाद गुलाटी
आज आईने में ख़ुद को देख कर याद आ गया
आज़ाद गुलाटी
वो रूह के गुम्बद में सदा बन के मिलेगा
आज़ाद गुलाटी
वो जो किसी का रूप धार कर आया था
आज़ाद गुलाटी
तुम्हारे पास रहें हम तो मौत भी क्या है
आज़ाद गुलाटी
तेरे क़दमों की आहट को तरसा हूँ
आज़ाद गुलाटी
सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था
आज़ाद गुलाटी
सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था
आज़ाद गुलाटी
साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए
आज़ाद गुलाटी
रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया
आज़ाद गुलाटी
फिर इस के बा'द का कोई न हो गुज़र मुझ में
आज़ाद गुलाटी
मेरा तो नाम रेत के सागर पे नक़्श है
आज़ाद गुलाटी
मैं बिछड़ कर तुझ से तेरी रूह के पैकर में हूँ
आज़ाद गुलाटी
मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ
आज़ाद गुलाटी
लम्हा लम्हा इक नई सई-ए-बक़ा करती हुई
आज़ाद गुलाटी
किस ने सदा दी कौन आया है
आज़ाद गुलाटी
ख़ला-ए-ज़ेहन के गुम्बद में गूँजता हूँ मैं
आज़ाद गुलाटी
कर्ब हरे मौसम का तब तक सहना पड़ता है
आज़ाद गुलाटी
कभी मिली जो तिरे दर्द की नवा मुझ को
आज़ाद गुलाटी
जो ग़म में जलते रहे उम्र-भर दिया बन कर
आज़ाद गुलाटी
हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ
आज़ाद गुलाटी
गो मिरा साथ मिरी अपनी नज़र ने न दिया
आज़ाद गुलाटी
एक हंगामा बपा है मुझ में
आज़ाद गुलाटी
डूब कर ख़ुद में कभी यूँ बे-कराँ हो जाऊँगा
आज़ाद गुलाटी
बहुत लम्बा सफ़र तपती सुलगती ख़्वाहिशों का था
आज़ाद गुलाटी
अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया
आज़ाद गुलाटी
आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए
आज़ाद गुलाटी
अफ़्सोस बे-शुमार सुख़न-हा-ए-ग़ुफतनी
आज़ाद अंसारी