Heart Broken Poetry (page 249)
हम दश्त से हर शाम यही सोच के घर आए
असग़र गोरखपुरी
इक उम्र मह-ओ-साल की ठोकर में रहा हूँ
असग़र गोरखपुरी
चलते चलते रुक जाता है
असग़र गोरखपुरी
आँखों की नदी सूख गई फिर भी हरा है
असग़र गोरखपुरी
उस जल्वा-गाह-ए-हुस्न में छाया है हर तरफ़
असग़र गोंडवी
मिरी वहशत पे बहस-आराइयाँ अच्छी नहीं ज़ाहिद
असग़र गोंडवी
माइल-ए-शेर-ओ-ग़ज़ल फिर है तबीअत 'असग़र'
असग़र गोंडवी
ऐ शैख़ वो बसीत हक़ीक़त है कुफ़्र की
असग़र गोंडवी
ज़ौक़-ए-सरमस्ती को महव-ए-रू-ए-जानाँ कर दिया
असग़र गोंडवी
यूँ न मायूस हो ऐ शोरिश-ए-नाकाम अभी
असग़र गोंडवी
ये क्या कहा कि ग़म-ए-इश्क़ नागवार हुआ
असग़र गोंडवी
वो नग़्मा बुलबुल-ए-रंगीं-नवा इक बार हो जाए
असग़र गोंडवी
तू एक नाम है मगर सदा-ए-ख़्वाब की तरह
असग़र गोंडवी
तिरे जल्वों के आगे हिम्मत-ए-शरह-ओ-बयाँ रख दी
असग़र गोंडवी
शिकवा न चाहिए कि तक़ाज़ा न चाहिए
असग़र गोंडवी
सामने उन के तड़प कर इस तरह फ़रियाद की
असग़र गोंडवी
रक़्स-ए-मस्ती देखते जोश-ए-तमन्ना देखते
असग़र गोंडवी
पाता नहीं जो लज़्ज़त-ए-आह-ए-सहर को मैं
असग़र गोंडवी
पास-ए-अदब में जोश-ए-तमन्ना लिए हुए
असग़र गोंडवी
न खुले उक़्दा-हा-ए-नाज़-ओ-नियाज़
असग़र गोंडवी
मता-ए-ज़ीस्त क्या हम ज़ीस्त का हासिल समझते हैं
असग़र गोंडवी
मस्ती में फ़रोग़-ए-रुख़-ए-जानाँ नहीं देखा
असग़र गोंडवी
मजाज़ कैसा कहाँ हक़ीक़त अभी तुझे कुछ ख़बर नहीं है
असग़र गोंडवी
मय-ए-बे-रंग का सौ रंग से रुस्वा होना
असग़र गोंडवी
कोई महमिल-नशीं क्यूँ शाद या नाशाद होता है
असग़र गोंडवी
ख़ुदा जाने कहाँ है 'असग़र'-ए-दीवाना बरसों से
असग़र गोंडवी
जो नक़्श है हस्ती का धोका नज़र आता है
असग़र गोंडवी
जीने का न कुछ होश न मरने की ख़बर है
असग़र गोंडवी
जान-ए-नशात हुस्न की दुनिया कहें जिसे
असग़र गोंडवी
इश्वों की है न उस निगह-ए-फ़ित्ना-ज़ा की है
असग़र गोंडवी