Hope Poetry (page 102)

लहू टपका किसी की आरज़ू से

बयान मेरठी

चराग़-ए-हुस्न है रौशन किसी का

बयान मेरठी

आएँगे गर उन्हें ग़ैरत होगी

बयान मेरठी

लहू टपका किसी की आरज़ू से

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

ये ख़ूब-रू न छुरी ने कटार रखते हैं

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

ये आरज़ू है कि वो नामा-बर से ले काग़ज़

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

मत सता मुझ को आन आन अज़ीज़

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

कोई समझाईयो यारो मिरा महबूब जाता है

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

जो ज़मीं पर फ़राग़ रखते हैं

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

जा कहे कू-ए-यार में कोई

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

फ़रहाद किस उम्मीद पे लाता है जू-ए-शीर

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

दिल अब उस दिल-शिकन के पास कहाँ

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

ज़ब्त-ए-ग़म कर भी लिया तो क्या किया

बासित भोपाली

उन का बर्बाद-ए-करम कहने के क़ाबिल हो गया

बासित भोपाली

शौक़ को बे-अदब किया इश्क़ को हौसला दिया

बासित भोपाली

नहीं ये जल्वा-हा-ए-राज़-ए-इरफ़ाँ देखने वाले

बासित भोपाली

कुछ सिला ही न मिला इश्क़ में जल जाने का

बासित भोपाली

कोई मेयार-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

हयात-ओ-मौत का इक सिलसिला है

बासित भोपाली

हर तरफ़ सोज़ का अंदाज़ जुदागाना है

बासित भोपाली

हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या

बासिर सुल्तान काज़मी

हज़ार कहता रहा मैं कि यार एक मिनट

बासिर सुल्तान काज़मी

हर-चंद मेरे हाल से वो बे-ख़बर नहीं

बासिर सुल्तान काज़मी

दिल में हर-चंद आरज़ू थी बहुत

बासिर सुल्तान काज़मी

बादल है और फूल खिले हैं सभी तरफ़

बासिर सुल्तान काज़मी

कभी दर पर कभी है रस्ते में

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

पूछते हैं वो इश्क़ का मतलब

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी