Hope Poetry (page 131)

इंकिशाफ़-ए-ज़ात के आगे धुआँ है और बस

अशअर नजमी

अंधेरे में तजस्सुस का तक़ाज़ा छोड़ जाना है

अशअर नजमी

उस से मिलने की तलब में जी लिए कुछ और दिन

अशहर हाशमी

शहर में छाई हुई दीवार-ता-दीवार थी

अशहर हाशमी

इक शहर ज़िया-बार यहाँ भी है वहाँ भी

अशहर हाशमी

हर लम्हा चाँद चाँद निखरना पड़ा मुझे

अाशा प्रभात

दैर-ओ-हरम भी आए कई इस सफ़र के बीच

अाशा प्रभात

तिरे महल में हज़ारों चराग़ जलते हैं

असग़र वेलोरी

हो गई अपनों की ज़ाहिर दुश्मनी अच्छा हुआ

असग़र वेलोरी

एक फ़ित्ना सा उठाया है चला जाएगा

असग़र वेलोरी

''ख़ुश्क पत्ता है तो हवा से डर''

असग़र शमीम

बात कुछ भी न थी क्यूँ ख़फ़ा हो गया

असग़र शमीम

इस एक बात से गुलचीं का दिल धड़कता है

असग़र सलीम

ग़ुबार सा है सर-ए-शाख़-सार कहते हैं

असग़र सलीम

रौनक़ तिरे कूचे की बढ़ाने चले आए

असग़र राही

अपने घर में मिरी तस्वीर सजाने वाले

असग़र राही

तारीख़ एक ख़ामोश ज़माना

असग़र नदीम सय्यद

शहर-बदर

असग़र नदीम सय्यद

एक आँच की कमी

असग़र नदीम सय्यद

धूप-भरी अजरक

असग़र नदीम सय्यद

छुट्टी का दिन

असग़र नदीम सय्यद

अपनी रात लय जाओ

असग़र नदीम सय्यद

कुल्लो-मन-अलैहा-फ़ान

असग़र मेहदी होश

अनार्किज़्म

असग़र मेहदी होश

प्यासा रहा मैं बाला-क़दी के फ़रेब में

असग़र मेहदी होश

बस्ती मिली मकान मिले बाम-ओ-दर मिले

असग़र मेहदी होश

बाहर का माहौल तो हम को अक्सर अच्छा लगता है

असग़र मेहदी होश

बचपन तमाम बूढ़े सवालों में कट गया

असग़र मेहदी होश

हम दश्त से हर शाम यही सोच के घर आए

असग़र गोरखपुरी

आँखों की नदी सूख गई फिर भी हरा है

असग़र गोरखपुरी