Islamic Poetry (page 33)

कभी आँसू कभी ख़्वाबों के धारे टूट जाते हैं

दिनेश ठाकुर

ग़म हमारा गुलाब हो जाए

दिनेश ठाकुर

औरत को चाहिए कि अदालत का रुख़ करे

दिलावर फ़िगार

शदीद गरमी के मौसम में मुशाइरा

दिलावर फ़िगार

मौसीक़ी से इलाज

दिलावर फ़िगार

लग गए हैं फ़ोन लगने में जो पच्चीस साल

दिलावर फ़िगार

कराची की बस

दिलावर फ़िगार

इलिएट्स-गर्ल्स-कॉलेज और कुल पाक ओ हिन्द मुशाएरा

दिलावर फ़िगार

चालीस चोर

दिलावर फ़िगार

या रब मिरे नसीब में अक्ल-ए-हलाल हो

दिलावर फ़िगार

हुस्न पर ए'तिबार हद कर दी

दिलावर फ़िगार

मैं सुर्ख़ फूल को छू कर पलटने वाला था

दिलावर अली आज़र

'आज़र' रहा है तेशा मिरे ख़ानदान में

दिलावर अली आज़र

ऐ इश्क़ तू ने वाक़िफ़-ए-मंज़िल बना दिया

दिल शाहजहाँपुरी

कहाँ मैं अभी तक नज़र आ सका हूँ

दिल अय्यूबी

रह गया ख़्वाब-ए-दिल-आराम अधूरा किस का

दिल अय्यूबी

कहाँ मैं अभी तक नज़र आ सका हूँ

दिल अय्यूबी

कुछ नहीं खुलता इब्तिदा क्या है

दीद राही

ज़िंदगी क्या है इब्तिला के सिवा

द्वारका दास शोला

मेरी मंज़िल कहाँ है क्या मा'लूम

द्वारका दास शोला

इंसाँ ब-यक निगाह बुरा भी भला भी है

द्वारका दास शोला

दिल-ए-बे-मुद्दआ का मुद्दआ' क्या

द्वारका दास शोला

देख जुर्म-ओ-सज़ा की बात न कर

द्वारका दास शोला

अपनों के सितम याद न ग़ैरों की जफ़ा याद

द्वारका दास शोला

अपनी बेचारगी पे रो न सके

द्वारका दास शोला

दैर ओ काबा में भटकते फिर रहे हैं रात दिन

दत्तात्रिया कैफ़ी

क़िस्मत बुरे किसी के न इस तरह लाए दिन

दत्तात्रिया कैफ़ी

हुस्न-ए-अज़ल का जल्वा हमारी नज़र में है

दत्तात्रिया कैफ़ी

फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगा

दत्तात्रिया कैफ़ी

ढूँढने से यूँ तो इस दुनिया में क्या मिलता नहीं

दत्तात्रिया कैफ़ी