Islamic Poetry (page 55)

एक और मुुहब्बत....

अंजुम सलीमी

ख़ुद अपने हाथ से क्या क्या हुआ नहीं मिरे साथ

अंजुम सलीमी

कैसी सोहबत है कैसी तन्हाई

अंजुम सलीमी

फ़लक-नज़ाद सही सर-निगूँ ज़मीं पे था मैं

अंजुम सलीमी

चराग़ हाथ में हो तो हवा मुसीबत है

अंजुम सलीमी

जाए ख़िरद नहीं है कि फ़रज़ाना चाहिए

अंजुम रूमानी

हम से भी गाहे गाहे मुलाक़ात चाहिए

अंजुम रूमानी

अदू तो क्या ये फ़लक भी उसे सता न सका

अंजुम मानपुरी

हज़ारों साल चलने कि सज़ा है

अंजुम लुधियानवी

अज़ाँ पे क़ैद नहीं बंदिश-ए-नमाज़ नहीं

अंजुम ख़याली

शब-ए-फ़िराक़ अचानक ख़याल आया मुझे

अंजुम ख़याली

घर में मिट्टी का दिया मौजूद है

अंजुम ख़याली

यही तुम पर भी खुलना है

अंजुम ख़लीक़

सितमगरों से डरूँ चुप रहूँ निबाह करूँ

अंजुम ख़लीक़

हम अपने ज़ौक़-ए-सफ़र को सफ़र सितारा करें

अंजुम ख़लीक़

तेशा-ब-कफ़ को आइना-गर कह दिया गया

अंजुम इरफ़ानी

मुतमइन बैठा हूँ ख़ुद को जान कर

अंजुम फ़ौक़ी बदायूनी

कुछ तो नया किया है हवा ने पता करो

अंजुम बाराबंकवी

ख़ाली भी तो कर ख़ाना-ए-दिल दुनिया से

अंजुम आज़मी

वा'दा है कि जब रोज़-ए-जज़ा आएगा

अंजुम आज़मी

धूप छाँव ज़ेहनों का आसरा नहीं रखते

अंजुम अज़ीमाबादी

जाते ही उन के ज़ीस्त की सूरत बदल गई

अनीसा बेगम

परवरदिगार दे मुझे ग़ैरत-शिआ'र आँख

अनीसा बेगम

मुसलमाँ ग़ौर कर क्यूँ आज तेरी

अनीसा बेगम

बहाए शबनम ने अश्क पैहम नसीम भरती है सर्द आहें

अनीसा बेगम

हर एक पल मुझे दुख दर्द बे-शुमार मिले

अनीस अब्र

नक़ाब उल्टा है शम्ओं' ने सितारो तुम तो सो जाओ

अनीस कैफ़ी

जहाँ दर था वहाँ दीवार क्यूँ है

अनीस अंसारी

भर नहीं पाया अभी तक ज़ख़्म-ए-कारी हाए हाए

अनीस अंसारी

मुझे इल्ज़ाम न दे तर्क-ए-शकेबाई का

अंदलीब शादानी