Love Poetry (page 250)

जाने क्यूँ लोग ग़म से डरते हैं

असर अकबराबादी

सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश

असद रज़ा

राहें धुआँ धुआँ हैं सफ़र गर्द गर्द है

असद रज़ा

हम से दीवानों को असरी आगही डसती रही

असद रज़ा

इन अक़्ल के बंदों में आशुफ़्ता-सरी क्यूँ है

असद मुल्तानी

हम-साई

असद जाफ़री

शश्दर-ओ-हैरान है जो भी ख़रीदारों में है

असद जाफ़री

मलाल-ए-हिज्र नहीं रंज-ए-बे-रुख़ी भी नहीं

असद जाफ़री

कोई दिल-जूई नहीं थी कोई शुनवाई न थी

असद जाफ़री

ख़याल यार मुझे जब लहू रुलाने लगा

असद जाफ़री

जो बज़्म-ए-दहर में कल तक थे ख़ुद-सरों की तरह

असद जाफ़री

जाऊँ कहाँ शुऊ'र-ए-हुनर किस के पास है

असद जाफ़री

जब तक वो शो'ला-रू मिरे पेश-ए-नज़र न था

असद जाफ़री

न बज़्म अपनी न अपना साक़ी न शीशा अपना न जाम अपना

असद भोपाली

न आया ग़म भी मोहब्बत में साज़गार मुझे

असद भोपाली

इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया

असद भोपाली

हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे

असद भोपाली

ग़ुंचा ओ गुल माह ओ अंजुम सब के सब बेकार थे

असद भोपाली

फ़र्क़ इतना है कि तू पर्दे में और मैं बे-हिजाब

असद भोपाली

ऐसे इक़रार में इंकार के सौ पहलू हैं

असद भोपाली

ऐ मौज-ए-हवादिस तुझे मालूम नहीं क्या

असद भोपाली

ज़िंदगी का हर नफ़स मम्नून है तदबीर का

असद भोपाली

तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा

असद भोपाली

न साथी है न मंज़िल का पता है

असद भोपाली

लब ओ रुख़्सार की क़िस्मत से दूरी

असद भोपाली

कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते

असद भोपाली

जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई

असद भोपाली

जब ज़रा रात हुई और मह ओ अंजुम आए

असद भोपाली

जब अपने पैरहन से ख़ुशबू तुम्हारी आई

असद भोपाली

इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया

असद भोपाली